श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| गणेशायतनैर्दिव्यैः पद्मरागमयैस्तथा।<br>चन्दनैर्विविधाकारैः पुष्पोद्यानैश्च शोभनैः॥ २८<br>तडागैर्दीर्घिकाभिश्च हेमसोपानपङ्क्तिभिः।<br>स्त्रीणां गतिजितैर्हंसैः सेविताभिः समन्ततः॥ २९<br>मयूरैश्चैव कारण्डैः कोकिलैश्चक्रवाकैः।<br>शोभिताभिश्च वापीभिर्दिव्यामृतजलैस्तथा॥ ३०<br>संलापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारावनम्रैश्च मदाघूर्णितलोचनैः॥ ३१<br>गेयनादरतैर्दिव्यै रुद्रकन्यासहस्रकैः।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरमरैरपि दुर्लभैः॥ ३२<br>प्रफुल्लाम्बुजवृन्दाद्यैस्तथा द्विजवरैरपि।<br>रुद्रस्त्रीगणसङ्कीर्णैर्जलक्रीडारतैस्तथा ॥ ३३<br>रतोत्सवरतैश्चैव ललितैश्च पदे पदे।<br>ग्रामरागानुरक्तैश्च पद्मरागसमप्रभैः॥ ३४<br>स्त्रीसङ्गैर्देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः।<br>दृष्ट्वा विस्मयमापन्नास्तस्थुर्देवाः समन्ततः॥ ३५ | तथा गुप्त कक्षोंसे सुशोभित; दृष्टिको मोह लेनेवाले मोतीके बने हुए अन्य सुन्दर ग्राम्य भवनोंसे युक्त; पद्मरागसे बने हुए दिव्य गणेश्वर-मन्दिरोंसे विभूषित; चन्दनके वृक्षोंसहित अनेक आकारवाले सुन्दर पुष्प-उद्यानोंसे सुशोभित; सोनेकी सीढ़ियोंकी पंक्तियोंसे युक्त और स्त्रियोंकी चालको तिरस्कृत करनेवाले हंसोंसे सभी ओरसे सेवित सरोवरों तथा बावलियोंसे विभूषित; मयूर, कारण्ड, कोकिल तथा चक्रवाकसे सुशोभित और दिव्य अमृतमय जलसे युक्त वापियोंसे विभूषित; वार्तालापमें कुशल, सभी आभूषणोंसे अलंकृत, वक्षःस्थलके भारसे झुकी हुई, मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली, गाने-बजानेमें तल्लीन तथा नृत्य करती हुई देवदुर्लभ दिव्य हजारों रुद्र-कन्याओं एवं अप्सराओंसे सुशोभित; विकसित कमल आदिसे युक्त; उत्तम पक्षियोंसे परिपूर्ण; रुद्रस्त्रीगणोंसे भरे हुए; जलक्रीड़ामें रत, रतोत्सवमें तल्लीन, प्रत्येक पदपर ललित, संगीतमें अनुरक्त तथा पद्मरागके समान कान्तिवाली स्त्रियोंसे सुशोभित पुरको देखकर सभी देवता पूर्णरूपसे आश्चर्यचकित होकर वहीं खड़े हो गये॥ २१–३५॥ | | तत्रैव ददृशुर्देवा वृन्दं रुद्रगणस्य च।<br>गणेश्वराणां वीराणामपि वृन्दं सहस्रशः॥ ३६<br>सुवर्णकृतसोपानान् वज्रवैदूर्यभूषितान्।<br>स्फाटिकान् देवदेवस्य ददृशुस्ते विमानकान्॥ ३७ | वहींपर देवताओंने रुद्रगणों, हजारों वीर गणेश्वरों, हीरे तथा वैदूर्यमणिसे जटित सुवर्णमय सीढ़ियों और देवदेवके स्फटिकनिर्मित भवनोंको देखा॥ ३६–३७॥ | | तेषां शृङ्गेषु हृष्टाश्च नार्यः कमललोचनाः।<br>विशालजघना यक्षा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ ३८<br>किन्नर्यः किन्नराश्चैव भुजङ्गाः सिद्धकन्यकाः।<br>नानावेषधराश्चान्या नानाभूषणभूषिताः॥ ३९<br>नानाप्रभावसंयुक्ता नानाभोगरतिप्रियाः।<br>नीलोत्पलदलप्रख्याः पद्मपत्रायतेक्षणाः॥ ४०<br>पद्मकिञ्जल्कसङ्काशैरंशुकैरतिशोभनाः ।<br>वलयैनूपुरैर्हारैश्छत्रैश्चित्रैस्तथांशुकैः ।<br>भूषिता भूषितैश्चान्यैर्मण्डिता मण्डनप्रियाः॥ ४१ | उन [भवनों]-के शिखरोंपर हृष्ट, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नरियाँ, किन्नर, नाग, सिद्धगणोंकी कन्याएँ, तथा अन्य स्त्रियाँ विराजमान थीं; वे अनेक वेष धारण की हुई थीं, अनेक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, अनेक हाव-भावोंसे युक्त थीं, अनेक भोग तथा रतिसे प्रेम करनेवाली थीं, नील कमलके पत्रके समान शोभावाली थीं, कमल-पत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली थीं, कमलकी पंखुड़ीके समान [कोमल] वस्त्रोंसे सुशोभित थीं, कंकण-नूपुर-हार-रंग-बिरंगे छत्र तथा वस्त्रोंसे भूषित थीं, अन्य प्रकारके आभूषणोंसे मण्डित थीं और सजावटसे प्रीति करनेवाली थीं॥ ३८–४१॥ |