भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ८१ ] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वमङ्गलदं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामपि मोक्षदम्॥ ७<br>सर्वव्याधिहरं चैव सर्वज्वरविनाशनम्।<br>देवैरनुष्ठितं पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ८दानोंमें उत्तम, दस हजार अश्वमेध यज्ञोंसे अधिक पुण्य देनेवाला, सभी मंगल प्रदान करनेवाला, पवित्र, समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला, संसार-सागरमें डूबे हुए प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला, सभी रोगोंको नष्ट करनेवाला तथा सभी ज्वरोंका विनाश करनेवाला है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंने किया था॥ २–८॥
कृत्वाकनीयसं लिङ्गं स्नाप्य चन्दनवारिणा।<br>चैत्रमासादि विप्रेन्द्राः शिवलिङ्गव्रतं चरेत्॥ ९<br>कृत्वा हैमं शुभं पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>नवरत्नैश्च खचितमष्टपत्रं यथाविधि॥ १०<br>कर्णिकायां न्यसेल्लिङ्गं स्फाटिकं पीठसंयुतम्।<br>तत्र भक्त्या यथान्यायमार्चयेद् बिल्वपत्रकैः॥ ११<br>सितैः सहस्त्रकमलै रक्तैर्नीलोत्पलैरपि।<br>श्वेतार्ककर्णिकारैश्च करवीरैर्बकैरपि॥ १२<br>एतैरन्यैर्यथालाभं गायत्र्या तस्य सुव्रताः।<br>सम्पूज्य चैव गन्धाद्यैर्धूपैर्दीपैश्च मङ्गलैः॥ १३<br>नीराजनाद्यैश्चान्यैश्च लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>अगरुं दक्षिणे दद्यादघोरेण द्विजोत्तमाः॥ १४<br>पश्चिमे सद्यमन्त्रेण दिव्यां चैव मनःशिलाम्।<br>उत्तरे वामदेवेन चन्दनं वापि दापयेत्॥ १५<br>पुरुषेण मुनिश्रेष्ठा हरितालं च पूर्वतः।<br>सितागरूद्भवं विप्रास्तथा कृष्णागरूद्भवम्॥ १६<br>तथा गुग्गुलुधूपं च सौगन्धिकमनुत्तमम्।<br>सितारं नाम धूपं च दद्यादीशाय भक्तितः॥ १७<br>महाचरुर्निवेद्यः स्यादाढकान्नमथापि वा।<br>एतद्वः कथितं पुण्यं शिवलिङ्गमहाव्रतम्॥ १८हे विप्रेन्द्रो! एक विशाल लिङ्ग बनाकर इसे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान कराकर चैत्र महीनेसे प्रारम्भ करके इस शिवलिङ्गव्रतको करना चाहिये। केसरकी कर्णिकासे युक्त, नौ रत्नोंसे जटित तथा आठ दलोंवाले एक सुन्दर सुवर्णमय कमलकी रचना करके उसकी कर्णिकामें विधिके अनुसार वेदीयुक्त स्फटिकके लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। हे सुव्रतो! उसमें भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार बिल्वपत्रोंसे, हजार श्वेत-लाल-नीले कमलोंसे, श्वेतमदारके कर्णिकारोंसे, कनैल पुष्पोंसे, कुरबकपुष्पोंसे तथा अन्य उपलब्ध पुष्पोंसे रुद्रगायत्री मन्त्रद्वारा उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे उत्तम द्विजो! गन्ध, धूप, दीप, नीराजन आदि मंगल उपचारोंसे लिङ्गमूर्ति महेश्वरका पूजन करके अघोर मन्त्रसे दक्षिणभागमें अगरु देना चाहिये, सद्योजात मन्त्रसे पश्चिम भागमें दिव्य मनःशिला और वामदेव मन्त्रसे उत्तर भागमें चन्दन अर्पित करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! तत्पुरुष मन्त्रसे पूर्व भागमें हरिताल प्रदान करना चाहिये। हे विप्रो! श्वेत अगरुसे तथा कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप, सुगन्धित तथा उत्तम गुग्गुलधूप और सितार नामक धूप भक्तिपूर्वक महेश्वरको अर्पित करना चाहिये। तत्पश्चात् महाचरुका नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये अथवा आढक-परिमाणमें अन्न निवेदित करना चाहिये। [हे विप्रो!] मैंने आप लोगोंको यह पुण्यदायक शिवलिङ्ग महाव्रत बता दिया॥ ९–१८॥
सर्वमासेषु सामान्यं विशेषोऽपि च कीर्त्यते।<br>वैशाखे वज्रलिङ्गं च ज्येष्ठे मारकतं तथा॥ १९<br>आषाढे मौक्तिकं लिङ्गं श्रावणे नीलनिर्मितम्।<br>मासि भाद्रपदे लिङ्गं पद्मरागमयं शुभम्॥ २०<br>आश्विने चैव विप्रेन्द्राः गोमेदकमयं शुभम्।<br>प्रवालेनैव कार्त्तिक्यां तथा वै मार्गशीर्षके॥ २१यह सभी महीनोंमें सामान्य शिवलिङ्गव्रत है; अब मैं विशेषका वर्णन करता हूँ। हे विप्रेन्द्रो! वैशाखमें वज्र (हीरा)-निर्मित लिङ्ग, ज्येष्ठमें मरकतनिर्मित लिङ्ग, आषाढ़में मोतीसे निर्मित लिङ्ग, सावनमें नीलमणिसे निर्मित लिङ्ग, भाद्रपदमासमें पद्मरागसे निर्मित सुन्दर लिङ्ग, आश्विन (क्वार)-में गोमेदसे निर्मित शुभ लिङ्ग, कार्त्तिकमें प्रवाल