भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 471

अध्याय ९१] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुक्मवर्णं द्रुमं पश्येद् गन्धर्वनगराणि च।<br>पश्येत्प्रेतपिशाचांश्च नवमासान् स जीवति॥ ५<br><br>अकस्माच्च भवेत्स्थूलो ह्यकस्माच्च कृशो भवेत्।<br>प्रकृतेश्च निवर्तेत चाष्टौ मासांश्च जीवति॥ ६स्वप्नमें मूत्र, पुरीष (विष्ठा), सुवर्ण अथवा रजत (चाँदी)-का वमन करता है, वह दस महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो स्वप्नमें सुनहरे वृक्षको देखता है और गन्धर्वनगरों तथा प्रेतपिशाचोंको देखता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल हो जाता है, अकस्मात् दुर्बल हो जाता है और अपने स्वभावसे दूर हो जाता है, वह आठ महीनेतक जीवित रहता है॥ २–६॥
अग्रतः पृष्ठतो वापि खण्डं यस्य पदं भवेत्।<br>पांसुके कर्दमे वापि सप्तमासान् स जीवति॥ ७<br><br>काकः कपोतो गृध्रो वा निलीयेद्यस्य मूर्धनि।<br>क्रव्यादो वा खगो यस्य षण्मासान्नातिवर्तते॥ ८<br><br>गच्छेद्व्रायसपङ्क्तीभिः पांसुवर्षेण वा पुनः।<br>स्वच्छायां विकृतां पश्येच्चतुः पञ्च स जीवति॥ ९<br><br>अनभ्रे विद्युतं पश्येदक्षिणां दिशमास्थिताम्।<br>उदके धनुरेन्द्रं वा त्रीणि द्वौ वा स जीवति॥ १०जिसके पैरकी आकृति धूल या कीचड़में सामने या पीछेसे खण्डित दिखायी दे, वह सात महीनेतक जीता है। जिसके सिरपर कौआ, कबूतर, गीध अथवा मांसभक्षी अन्य पक्षी बैठ जाता है, वह छः महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो कौओंकी पंक्तियोंके साथ गमन करता है अथवा धूलवृष्टि (आँधी)-के साथ गमन करता है और अपनी छायाको विकृत देखता है, वह चार-पाँच महीनेतक जीता है। जो मेघरहित आकाशमें विद्युत्‌को दक्षिण दिशामें स्थित देखता है अथवा जलमें इन्द्रधनुषको देखता है, वह दो अथवा तीन महीनेतक जीवित रहता है॥ ७–१०॥
अप्सु वा यदि वादर्शे यो ह्यात्मानं न पश्यति।<br>अशिरस्कं तथा पश्येन्मासादूर्ध्वं न जीवति॥ ११<br><br>शवगन्धि भवेद् गात्रं वसागन्धमथापि वा।<br>मृत्युर्ह्युपागतस्तस्य अर्धमासान्न जीवति॥ १२<br><br>यस्य वै स्नातमात्रस्य हृदयं परिशुष्यति।<br>धूमं वा मस्तकात्पश्येद्वशहान्न स जीवति॥ १३जो जलमें अथवा दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको नहीं देख पाता है और अपनेको सिरविहीन देखता है, वह एक महीनेसे अधिक नहीं जीता है। यदि किसीका शरीर शवकी गन्धवाला अथवा चर्बीकी गन्धवाला हो जाता है, तो उसकी मृत्यु समीप आयी हुई होती है; वह आधे महीनेसे अधिक नहीं जीवित रहता है। स्नान करनेके तुरंत बाद जिसका हृदय सूख जाता है अथवा मस्तकसे धुआँ दिखायी देता है, वह दस दिनसे अधिक नहीं जीता है॥ ११–१३॥
सम्भिन्नो मारुतो यस्य मर्मस्थानानि कृन्तति।<br>अद्भिः स्पृष्टो न हृष्येत तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ १४प्रवाहमय वायु जिसके मर्मस्थानोंको भेद देता है और जो जलसे स्पृष्ट होकर प्रसन्न नहीं होता है, उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये।
ऋक्षवानरयुक्तेन रथेनाशां च दक्षिणाम्।<br>गायन्नृत्यन् व्रजेत्स्वप्ने विद्यान्मृत्युरुपस्थितः॥ १५यदि कोई स्वप्नमें ऋक्ष (भालू) तथा बन्दरसे जुते हुए रथसे दक्षिण दिशाकी ओर गाते तथा नाचते हुए यात्रा करता है, तो उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये।
कृष्णाम्बरधरा श्यामा गायन्ती वाप्यथाङ्गना।<br>यं नयेद्दक्षिणामाशां स्वप्ने सोऽपि न जीवति॥ १६स्वप्नमें काले रंगका वस्त्र धारण किये कृष्ण वर्णवाली