भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 546

| सहदेव्या नमश्चक्रुः शिरोभिर्भूतलाश्रितैः ।<br>सर्वे सब्रह्मका देवाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ६३ । | समर्पित कर दी। ब्रह्मा-यक्ष-उरग-राक्षसोंसहित सभी देवताओंने 'साधु-साधु' कहकर वहाँपर उन पार्वतीके द्वारा पूजित शिवको उन देवीसमेत पृथ्वीतलपर मस्तक टेककर प्रणाम किया॥ ६१–६३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमास्वयंवरो नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमास्वयंवर' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०२॥


एक सौ तीनवाँ अध्याय

भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना

सूत उवाचसूतजी बोले—
अथ ब्रह्मा महादेवमभिवन्द्य कृताञ्जलिः।<br>उद्वाहः क्रियतां देव इत्युवाच महेश्वरम् ॥ १[हे ऋषियो!] इसके बाद ब्रह्माने हाथ जोड़कर महादेव महेश्वरको प्रणाम करके यह कहा—'हे देव! अब विवाह कीजिये'॥ १॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>यथेष्टमिति लोकेशं प्राह भूतपतिः प्रभुः ॥ २उन परमेष्ठी ब्रह्माका वह वचन सुनकर भूतपति शिवने लोकेश [ब्रह्मा]-से कहा—'जो आपकी इच्छा हो'॥ २॥
उद्वाहार्थं महेशस्य तत्क्षणादेव सुव्रताः।<br>ब्रह्मणा कल्पितं दिव्यं पुरं रत्नमयं शुभम् ॥ ३हे सुव्रतो! ब्रह्माने महेशके विवाहके लिये उसी क्षण रत्नमय, दिव्य तथा सुन्दर नगरका निर्माण किया॥ ३॥
अथादितिर्दितिः साक्षाद्दनुः कद्रूः सुकालिका।<br>पुलोमा सुरसा चैव सिंहिका विनता तथा ॥ ४<br>सिद्धिर्माया क्रिया दुर्गा देवी साक्षात्सुधा स्वधा।<br>सावित्री वेदमाता च रजनी दक्षिणा द्युतिः ॥ ५<br>स्वाहा स्वधा मतिर्बुद्धिर्ऋद्धिर्वृद्धिः सरस्वती।<br>राका कुहूः सिनीवाली देवी अनुमती तथा ॥ ६<br>धरणी धारणी चेला शची नारायणी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवानां मातरः पत्नयस्तथा ॥ ७<br>उद्वाहः शङ्करस्येति जग्मुः सर्वा मुदान्विताः।<br>उरगा गरुडा यक्षा गन्धर्वाः किन्नरा गणाः ॥ ८<br>सागरा गिरयो मेघा मासाः संवत्सरास्तथा।<br>वेदा मन्त्रास्तथा यज्ञाः स्तोमा धर्माश्च सर्वशः ॥ ९<br>हुङ्कारः प्रणवश्चैव प्रतिहाराः सहस्रशः।<br>कोटिरप्सरसो दिव्यास्तासां च परिचारिकाः ॥ १०<br>याश्च सर्वेषु द्वीपेषु देवलोकेषु निम्नगाः।<br>ताश्च स्त्रीविग्रहाः सर्वाः सज्जग्मुर्हृष्टमानसाः ॥ ११<br>गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः।<br>उद्वाहः शङ्करस्येति तत्राजग्मुर्मुदान्विताः ॥ १२इसके बाद अदिति, दिति, साक्षात् दनु, कद्रू, सुकालिका, पुलोमा, सुरसा, सिंहिका, विनता, सिद्धि, माया, क्रिया, साक्षात् देवी दुर्गा, सुधा, स्वधा, वेदमाता सावित्री, रजनी, दक्षिणा, द्युति, स्वाहा, स्वधा, मति, बुद्धि, ऋद्धि, वृद्धि, सरस्वती, राका, कुहू, सिनीवाली, देवी अनुमती, धरणी, धारणी, इला, शची, नारायणी—ये सब एवं अन्य सभी देवमाताएँ तथा देवपत्नयाँ 'शंकरका विवाह हो रहा है'—ऐसा सोचकर आनन्दमग्न होकर [वहाँ] गयीं। सभी उरग, गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, गण, समुद्र, पर्वत, मेघ, मास, संवत्सर, वेद, मन्त्र, यज्ञ, स्तोम, धर्म, हुंकार, प्रणव, हजारों प्रतिहार, करोड़ों दिव्य अप्सराएँ तथा उनकी परिचारिकाएँ और समस्त द्वीपों तथा देवलोकोंमें जो भी नदियाँ हैं, वे सब स्त्रीका रूप धारण करके प्रसन्नचित्त होकर वहाँ गयीं। सभी लोकोंसे नमस्कृत महाभाग गणेश्वर भी 'यह शंकरका विवाह है'—यह सोचकर प्रसन्नतासे युक्त हो वहाँ आये॥ ४–१२॥