श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०६] भगवान् शिवद्वारा काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना [५५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम्।<br>मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञोऽपि चतुर्मुखः॥ १२ | अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये। मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे॥ १०-१२॥ |
| सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती।<br>कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः॥ १३ | उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया॥ १३॥ |
| तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै।<br>ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम्॥ १४ | इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव]-ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी (कृष्णवर्णके कण्ठवाली) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया॥ १४॥ |
| जाता यदा कालिमकालकण्ठी<br>जाता तदानीं विपुला जयश्रीः।<br>देवेतराणामजयस्त्वसिद्ध्या<br>तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य॥ १५ | जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुई। अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [शिव]-को प्रसन्नता हुई॥ १५॥ |
| जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा<br>दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम्।<br>कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-<br>मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः॥ १६ | विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे॥ १६॥ |
| तथैव जातं नयनं ललाटे<br>सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा।<br>कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं<br>करे करालं च विभूषणानि॥ १७ | उनके ललाटमें शिवकी भाँति [तीसरा] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [कालकूट] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पोंके हार-कुण्डल आदि] आभूषण धारण किये हुए थीं॥ १७॥ |
| सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः।<br>सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः॥ १८ | कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए॥ १८॥ |
| आज्ञया दारुकं तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी।<br>दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान्॥ १९ | तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [काली]-ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया॥ १९॥ |
| संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत्।<br>क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम्॥ २० | हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब |
| भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले।<br>रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः॥ २१ | ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [काशीमें] श्मशानमें [जाकर] |