श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५५१
| उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः।<br>कुमार इव तेजस्वी क्रीडमानो यदृच्छया॥ ३<br><br>कदाचित्क्षीरमल्पं च पीतवान् मातुलाश्रमे।<br>ईर्ष्यया मातुलसुतो ह्यपिबत् क्षीरमुत्तमम्॥ ४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! 'उपमन्यु'—इस नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे; कुमारके समान तेजस्वी उन्होंने किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [अपने] मामाके आश्रममें थोड़ा-सा दूध पी लिया, तब ईर्ष्याके कारण उनके मामाके पुत्रने उत्तम दुग्धका पान किया॥ ३-४॥ |
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| पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम्।<br>मातर्मातर्महाभागे मम देहि तपस्विनि॥ ५<br><br>गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम्। | तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पासमें खड़ा देखकर उपमन्युने अपनी मातासे कहा—हे मातः! हे महाभागे! हे तपस्विनि! आप मुझको गायका दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट हो, गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ५ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>उपलालितैवं पुत्रेण पुत्रमालिङ्ग्य सादरम्॥ ६<br><br>दुःखिता विललापार्ता स्मृत्वा नैर्धन्यमात्मनः।<br>स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजाः।<br>देहि देहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः॥ ७ | सूतजी बोले—इस प्रकार पुत्रके द्वारा स्नेह-पूर्वक कही गयी वह बात सुनकर माता आदरके साथ पुत्रका आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनताका स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी। हे द्विजो! बार-बार दूधका स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी मातासे रोते हुए यही कहते थे—'मुझे दो, मुझे दो'॥ ६-७॥ |
| उञ्छवृत्त्यार्जितान् बीजान् स्वयं पिष्ट्वा च सा तदा।<br>बीजपिष्टं तदालोड्य तोयेन कलभाषिणी॥ ८<br><br>एह्येहि मम पुत्रेति सामपूर्वं ततः सुतम्।<br>आलिङ्ग्यादाय दुःखार्ता प्रददौ कृत्रिमं पयः॥ ९ | तत्पश्चात् उंछवृत्ति (फसल कट जानेके बाद खेतमें पड़े दानोंको बटोरना)-से अर्जित बीजोंको स्वयं पीसकर पुनः बीजके उस आटेको जलके साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, 'हे मेरे पुत्र! आओ, आओ।' इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्रको पकड़कर आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल माताने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया॥ ८-९॥ |
| पीत्वा च कृत्रिमं क्षीरं मात्रा दत्तं द्विजोत्तमः।<br>नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चातिविह्वलः॥ १० | तब माताके द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्धको पीकर द्विजश्रेष्ठ [उपमन्यु]-ने अति विह्वल होकर मातासे कहा—'यह दूध नहीं है'॥ १०॥ |
| दुःखिता सा तदा प्राह सम्प्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि।<br>सम्मार्ज्य नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते॥ ११ | तब दुःखसे भरी हुई उस माताने बालककी ओर देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथोंसे पुत्रके कमलसदृश विशाल नेत्रोंको पोंछकर कहा— |
| तटिनी रत्नपूर्णास्ते स्वर्गपातालगोचराः।<br>भाग्यहीना न पश्यन्ति भक्तिहीनाश्च ये शिवे॥ १२ | '[हे पुत्र!] जो शिवके प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नोंसे परिपूर्ण तथा स्वर्ग-पातालमें गोचर होनेवाली नदियोंको नहीं देख पाते हैं। |
| राज्यं स्वर्गं च मोक्षं च भोजनं क्षीरसम्भवम्।<br>न लभन्ते प्रियाण्येषां नो तुष्यति सदा भवः॥ १३ | शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्धसे बने हुए भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओंको नहीं प्राप्त कर सकते |