भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति [ ५७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मार्कण्डेय उवाच<br><br>श्रुतो मयायमर्थो वै नारदाद्देवदर्शनात्।<br>स्वयमाह महातेजा नारदोऽसौ महामतिः॥ ३मार्कण्डेयजी बोले— मैंने दिव्य दर्शनवाले नारदजीसे यह रहस्य सुना था। उन महातेजस्वी तथा महामति नारदने मुझे स्वयं बताया था॥ ३॥
सन्तप्यमानो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।<br>निरुच्छ्वासेन संयुक्तस्तुम्बुरोर्गौरवं स्मरन्॥ ४<br>तताप च महाघोरं तपोराशिस्तपः परम्।<br>अथान्तरिक्षे शुश्राव नारदोऽसौ महामुनिः॥ ५<br>वाणीं दिव्यां महाघोषामद्भुतामशरीरिणीम्।<br>किमर्थं मुनिशार्दूल तपस्तपसि दुश्चरम्॥ ६<br>उलूकं पश्य गत्वा त्वं यदि गाने रता मतिः।<br>मानसोत्तरशैले तु गानबन्धुरिति स्मृतः॥ ७<br>गच्छ शीघ्रं च पश्यैनं गानवित्त्वं भविष्यसि।<br>इत्युक्तो विस्मयाविष्टो नारदो वाग्विदां वरः॥ ८तपोनिधि भगवान् नारदने कष्ट सहते हुए प्राणायामसे श्वास रोककर तुम्बुरुगन्धर्वके गौरवका स्मरण करते हुए दिव्य हजार वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उन महामुनि नारदने अन्तरिक्षमें तीव्र ध्वनिवाली यह अद्भुत दिव्य आकाशवाणी सुनी—'हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह अत्यन्त कठिन तप किसलिये कर रहे हैं? यदि आपकी मति गानमें संलग्न है, तो आप मानसोत्तरपर्वतपर जाकर वहाँ उलूकको देखिये; उसे गानबन्धु कहा गया है। शीघ्र जाइये और इसका दर्शन कीजिये; इससे आप गानवेत्ता हो जायेंगे'॥ ४—७½॥
मानसोत्तरशैले तु गानबन्धुं जगाम वै।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसां गणाः॥ ९<br>समासीनास्तु परितो गानबन्धुं ततस्ततः।<br>गानविद्यां समापन्नः शिक्षितास्तेन पक्षिणा॥ १०[आकाशवाणीके द्वारा] ऐसा कहे गये वे वाणीवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी आश्चर्यचकित होकर मानसोत्तरपर्वतपर गानबन्धु उलूकके पास गये। गानबन्धुके चारों ओर गन्धर्व, किन्नर, यक्ष तथा अप्सराओंके समूह यत्र-तत्र बैठे हुए थे। वह पक्षी (उलूक) वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए मधुर कण्ठस्वरवाले गन्धर्व आदिको गानविद्याकी शिक्षा दे रहा था॥ ८—१०½॥
स्निग्धकण्ठस्वरास्तत्र समासीना मुदान्विताः।<br>ततो नारदमालोक्य गानबन्धुरुवाच ह॥ ११<br>प्रणिपत्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत्।<br>किमर्थं भगवानत्र चागतोऽसि महामते॥ १२<br>किं कार्यं हि मया ब्रह्मन् ब्रूहि किं करवाणि ते।तदनन्तर नारदजीको देखकर उन्हें प्रणाम करके गानबन्धुने स्वागतके द्वारा उचितरूपसे उनका सत्कार किया और उनसे कहा—'हे महामते! आप भगवन् यहाँ किसलिये आये हैं? हे ब्रह्मन्! मुझसे आपका कौन-सा कार्य है; आप बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'॥ ११-१२½॥
नारद उवाच<br><br>उलूकेन्द्र महाप्राज्ञ शृणु सर्वं यथातथम्॥ १३<br>मम वृत्तं प्रवक्ष्यामि पुरा भूतं महाद्भुतम्।<br>अतीते हि युगे विद्वन्नारायणसमीपगम्॥ १४<br>मां विनिर्धूय संहृष्टः समाहूय च तुम्बरुम्।<br>लक्ष्मीसमन्वितो विष्णुःशृणोद्गानमुत्तमम्॥ १५<br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे निरस्ताः स्थानतोऽच्युताः।<br>कौशिकाद्याः समासीना गानयोगेन वै हरिम्॥ १६नारदजी बोले— हे परम बुद्धिसम्पन्न उलूकेन्द्र! सुनिये; मैं अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताऊँगा। पूर्वकालमें एक अत्यन्त विलक्षण घटना घटी थी। हे विद्वन्! मैं बीते युगमें नारायणके पास गया हुआ था; किंतु वे विष्णु मेरा तिरस्कार करके तुम्बुरुको प्रसन्नतापूर्वक बुलाकर भगवती लक्ष्मीके साथ उत्तम गान सुनने लगे। ब्रह्मा आदि सभी देवता उस स्थानसे निष्कासित कर दिये गये, किंतु कौशिक आदिको नहीं निकाला गया