भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ५९९


छठा अध्याय

भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>मायावित्वं श्रुतं विष्णोर्देवदेवस्य धीमतः।<br>कथं ज्येष्ठासमुत्पत्तिर्देवदेवाज्जनार्दनात्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं लोमहर्षण तत्त्वतः।<br>सूत उवाच<br>अनादिनिधनः श्रीमान् धाता नारायणः प्रभुः॥ २<br>जगद्द्वैधमिदं चक्रे मोहनाय जगत्पतिः।<br>विष्णुर्वै ब्राह्मणान्वेदान्वेदधर्मान् सनातनान्॥ ३<br>श्रियं पद्मा तथा श्रेष्ठां भागमेकमकारयत्।<br>ज्येष्ठामलक्ष्मीमशुभां वेदबाह्यान्नराधमान्॥ ४<br>अधर्मं च महातेजा भागमेकमकल्पयत्।ऋषिगण बोले—देवोंके भी देव धीमान् विष्णुका मायावी होना तो हमलोगोंने सुन लिया। हे लोमहर्षण! अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि देवदेव जनार्दनसे ज्येष्ठा (अलक्ष्मी-) की उत्पत्ति कैसे हुई?॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले—आदि तथा अन्तसे रहित, ऐश्वर्यशाली, प्रभुतासम्पन्न तथा जगत्के स्वामी नारायण विष्णुने प्राणियोंको व्यामोहमें डालनेके लिये इस जगत्को दो प्रकारका बनाया है। उन महातेजस्वी विष्णुने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्मों, श्री तथा श्रेष्ठ पद्माकी उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ तथा ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेदविरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्मका निर्माण करके एक दूसरा भाग किया॥ २—४ १/२॥
अलक्ष्मीमग्रतः सृष्ट्वा पश्चात्पद्मां जनार्दनः॥ ५<br>ज्येष्ठा तेन समाख्याता अलक्ष्मीर्द्विजसत्तमाः।<br>अमृतोद्भववेलायां विषानन्तरमुल्बणात्॥ ६<br>अशुभा सा तथोत्पन्ना ज्येष्ठा इति च वै श्रुतम्।<br><br>ततः श्रीश्च समुत्पन्ना पद्मा विष्णुपरिग्रहः॥ ७हे श्रेष्ठ द्विजगण! भगवान् जनार्दनने पहले अलक्ष्मीका सृजन करके ही पद्मा (लक्ष्मी-) का सृजन किया है, इसीलिये अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयी हैं। अमृतकी उत्पत्तिके समय महाभयंकर विष निकलनेके पश्चात् पहले वे ज्येष्ठा अशुभ अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, ऐसा सुना गया है। उसके अनन्तर विष्णुभार्या लक्ष्मी पद्मा आविर्भूत हुईं॥ ५—७॥
दुःसहो नाम विप्रर्षिरुपयेमेऽशुभां तदा।<br>ज्येष्ठां तां परिपूर्णोऽसौ मनसा वीक्ष्य धिष्ठिताम्॥ ८<br>लोकं चचार हृष्टात्मा तया सह मुनिस्तदा।<br>यस्मिन् घोषो हरेश्चैव हरस्य च महात्मनः॥ ९<br>वेदघोषस्तथा विप्रा होमधूमस्तथैव च।<br>भस्माङ्गिनो वा यत्रासंस्तत्र तत्र भयार्दिता॥ १०<br>पिधाय कर्णौ संयाति धावमाना इतस्ततः।<br>ज्येष्ठामेवंविधां दृष्ट्वा दुःसहो मोहमागतः॥ ११तब [लक्ष्मीके विवाहसे पूर्व] दुःसह नामक विप्रर्षिने उस अशुभा ज्येष्ठाके साथ विवाह किया तथा उसको परिगृहीत देख स्वयंको परिपूर्ण माना; तब वे मुनि प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ लोकमें विचरण करने लगे। हे विप्रो! जिस स्थानपर विष्णु तथा महात्मा शिवके नामका घोष तथा वेदध्वनि होती थी, हवनका धूम दीखता था अथवा अंगोंमें भस्म धारण किये हुए लोग रहते थे, वहाँपर वह अलक्ष्मी भयातुर होकर अपने दोनों कान बन्द करके इधर-उधर भागती हुई जाती थी। उस ज्येष्ठाको इस प्रकारके स्वभाववाली देखकर मुनि दुःसह उद्विग्न हो उठे॥ ८—११॥