भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ६ ]भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा — दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव६०३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उदुम्बरं वा पनसं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>यस्य काकगृहं निम्बे आरामे वा गृहेऽपि वा॥ ५१<br><br>दण्डिनी मुण्डिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश।<br>एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पञ्चमाहिषम्॥ ५२कटहलके वृक्ष हों, उनके यहाँ तुम अपनी भार्याके साथ निवास करो। जिसके निम्बवृक्षमें, बगीचेमें अथवा घरमें कौवोंका निवास हो और जिसके घरमें दण्डधारिणी तथा कपालधारिणी स्त्री हो, उसके यहाँ तुम पत्नीसहित निवास करो॥ ४६—५१ १/२॥
षडश्वं सप्तमातङ्गं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी॥ ५३<br><br>क्षेत्रपालोऽथ वा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>भिक्षुबिम्बं च वै यस्य गृहे क्षपणकं तथा॥ ५४<br><br>बौद्धं वा बिम्बमासाद्य तत्र पूर्णं समाविश।<br>शयनासनकालेषु भोजनाटनवृत्तिषु॥ ५५<br><br>येषां वदति नो वाणी नामानि च हरेः सदा।<br>तद्गृहं ते समाख्यातं सभार्यस्य निवेशितुम्॥ ५६जिस घरमें एक दासी, तीन गायें, पाँच भैंसे, छः घोड़े और सात हाथी हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो। जिस घरमें प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली-प्रतिमा स्थापित हो और जहाँ भैरव-मूर्ति हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें भिक्षुबिम्ब आदि हो, वहाँ तुम यथेच्छ निवास करो। सोने, बैठने, भोजन तथा भ्रमणके समयोंमें जिनकी वाणी (जिह्वा) सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका उच्चारण नहीं करती, उनका घर सपत्नीक तुम्हारे निवास करनेके लिये मैं बता रहा हूँ॥ ५२—५६॥
पाषण्डाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः।<br>विष्णुभक्तिविनिर्मुक्ता महादेवविनिन्दकाः॥ ५७<br><br>नास्तिकाश्च शठा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदन्ति पिनाकिनः॥ ५८जहाँ दम्भपूर्ण आचारमें निरत रहनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख रहनेवाले, विष्णुभक्तिसे विहीन, महादेवकी निन्दा करनेवाले, नास्तिक तथा शठ लोग हों, वहाँपर तुम पत्नीसहित निवास करो॥ ५७ १/२॥
साधारणं स्मरन्त्येनं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रः सर्वसुरेश्वरः॥ ५९<br><br>रुद्रप्रसादजाश्चेति न वदन्ति दुरात्मकाः।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रश्च सम एव च॥ ६०<br><br>वदन्ति मूढाः खद्योतं भानुं वा मूढचेतसः।<br>तेषां गृहे तथा क्षेत्रे आवासे वा सदानघा॥ ६१जो लोग भगवान् शिवको सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते हैं और इन्हें साधारण समझते हैं, उनके यहाँ तुम भार्यासहित निवास करो। कलुषित मनवाले जो लोग 'ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा सभी देवताओंके स्वामी इन्द्र—ये रुद्रके प्रसादसे आविर्भूत हैं'—ऐसा नहीं कहते हैं और ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रको इनके समान कहते हैं; साथ ही जो मूढ़ तथा अज्ञानी लोग सूर्यको खद्योत कहते हैं—उनके गृह, क्षेत्र तथा आवासमें तुम सदा इसके साथ निवास करो और पूर्ण रूपसे अनन्यबुद्धि होकर उनके घरमें भोग करो॥ ५८—६१ १/२॥
विश भुङ्क्ष्व गृहं तेषां अपि पूर्णमनन्यधीः।<br>येऽश्नन्ति केवलं मूढाः पक्वमन्नं विचेतसः॥ ६२<br><br>स्नानमङ्गलहीनाश्च तेषां त्वं गृहमाविश।<br>या नारी शौचविभ्रष्टा देहसंस्कारवर्जिता॥ ६३जो मूर्ख तथा अज्ञानी लोग अकेले ही पका हुआ अन्न खाते हैं और स्नान आदि मंगलकार्योंसे विहीन रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो स्त्री