श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १० ] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन [ ६१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनुल्लङ्घ्य आज्ञासे देवताओंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं तथा उन्हीं शिवके शासनसे अधार्मिकोंका नाश करते हैं॥ २५-३०॥ | |
| वरुणः सलिलैर्लोकान् सम्भावयति शासनात्।<br>मजयत्याज्ञया तस्य पाशैर्बध्नाति चासुरान्॥ ३१<br><br>पुण्यानुरूपं सर्वेषां प्राणिनां सम्प्रयच्छति।<br>वित्तं वित्तेश्वरस्तस्य शासनात्परमेष्ठिनः॥ ३२<br><br>उदयास्तमये कुर्वन् कुरुते कालमाज्ञया।<br>आदित्यस्तस्य नित्यस्य सत्यस्य परमात्मनः॥ ३३<br><br>पुष्पाण्यौषधिजातानि प्रह्लादयति च प्रजाः।<br>अमृतांशुः कलाधारः कालकालस्य शासनात्॥ ३४ | उन्हीं शिवकी आज्ञासे वरुणदेव अपने जलसे सभी लोकोंको सन्तुष्ट करते हैं और उन्हींकी आज्ञासे असुरोंको अपने पाशोंसे बाँधते हैं तथा बादमें जलमें डुबा देते हैं। उन परमेष्ठी शिवके ही आदेशसे धनके स्वामी कुबेर समस्त प्राणियोंको उनके पुण्यके अनुसार धन प्रदान करते हैं। उन्हीं शाश्वत तथा सत्यस्वरूप परमात्माकी आज्ञासे सूर्यदेव उदय तथा अस्तरूप कार्यको करते हुए कालनिर्धारण करते हैं। कालके भी काल शिवके ही आदेशसे कलाधार चन्द्रमा पुष्पों, औषधियों तथा जीवोंको आनन्दित करते हैं॥ ३१-३४॥ |
| आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।<br>अन्याश्च देवताः सर्वास्तच्छासनविनिर्मिताः॥ ३५<br><br>गन्धर्वा देवसङ्घाश्च सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रेषु वेधसः॥ ३६<br><br>ग्रहनक्षत्रताराश्च यज्ञा वेदास्तपांसि च।<br>ऋषीणां च गणाः सर्वे शासनं तस्य धिष्ठिताः॥ ३७<br><br>कव्याशिनां गणाः सप्तसमुद्रा गिरिसिन्धवः।<br>शासने तस्य वर्तन्ते काननानि सरांसि च॥ ३८<br><br>कलाः काष्ठा निमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋत्वब्दपक्षमासाश्च नियोगात्तस्य धिष्ठिताः॥ ३९<br><br>युगमन्वन्तराण्यस्य शम्भोस्तिष्ठन्ति शासनात्।<br>पराश्चैव परार्थाश्च कालभेदास्तथापरे॥ ४० | सभी आदित्य, वसुगण, समस्त रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण तथा अन्य समस्त देवता उन्हीं शिवके शासनसे विनिर्मित हैं। गन्धर्व, देवसमुदाय, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच शिवके ही शासनमें स्थित हैं। ग्रह, नक्षत्र, तारा, यज्ञ, वेद, तप तथा ऋषिगण—ये सब उन्हींके शासनमें अधिष्ठित हैं। पितरोंके समूह, सातों समुद्र, पर्वत, नदियाँ, वन तथा सरोवर भी उन्हींके शासनमें रहते हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतु, वर्ष, पक्ष तथा मास उन्हींके अनुशासनमें अधिष्ठित हैं; उसी प्रकार युग, मन्वन्तर, पर, परार्ध तथा दूसरे अन्य कालभेद भी इन्हीं शम्भुके शासनसे प्रवर्तित होते हैं॥ ३५-४०॥ |
| देवानां जातयश्चाष्टौ तिरश्चां पञ्चजातयः।<br>मनुष्याश्च प्रवर्तन्ते देवदेवस्य धीमतः॥ ४१<br><br>जातानि भूतवृन्दानि चतुर्दशसु योनिषु।<br>सर्वलोकनिषण्णानि तिष्ठन्त्यस्यैव शासनात्॥ ४२<br><br>चतुर्दशसु लोकेषु स्थिता जाताः प्रजाः प्रभोः।<br>सर्वेश्वरस्य तस्यैव नियोगवशवर्तिनः॥ ४३ | उन्हीं बुद्धिसम्पन्न देवदेवके शासनसे देवताओंकी [विद्याधर आदि] आठ जातियाँ, पशु-पक्षियोंकी पाँच जातियाँ तथा मनुष्य प्रवर्तित होते हैं। सभी लोकोंमें रहनेवाले इन देवता आदि चौदह योनियोंमें उत्पन्न सभी प्राणीसमूह इन्हीं शिवके शासनमें रहते हैं। चौदह लोकोंमें स्थित रहनेवाली सभी प्रजाएँ उन्हीं परमेश्वर प्रभु शिवके शासनके अधीन रहती हैं॥ ४१-४३॥ |
| पातालानि समस्तानि भुवनान्यस्य शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च शेषाणि तथा सावरणानि च॥ ४४ | पाताल आदि समस्त भुवन तथा [जल आदि] आवरणोंसे युक्त ब्रह्माण्ड इन्हींके शासनसे स्थित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभीसे युक्त समस्त वर्तमान |