भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 632
६३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
अष्टमूर्तेर्महेशस्य स एव विहितो भवेत्।<br>यद्यवज्ञा कृता लोके यस्य कस्यचिदङ्गिनः॥ ३२<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य विहिता सा भवेद्विभोः।<br>अभयं यत् प्रदत्तं स्यादङ्गिनो यस्य कस्यचित्॥ ३३<br>आराधनं कृतं तस्मादष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं प्रदानमभयस्य च॥ ३४<br>आराधनं तु देवस्य अष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं सर्वानुग्रह एव च॥ ३५<br>तदर्चनं परं प्राहुरष्टमूर्तेर्मुनीश्वराः।<br>अनुग्रहणमन्येषां विधातव्यं त्वयाङ्गिनाम्॥ ३६<br>सर्वभयप्रदानं च शिवाराधनमिच्छता॥ ३७महेशका ही अनादर किया गया है। जिस किसी भी प्राणीको जो अभय प्रदान किया जाता है, उससे मानो अष्टमूर्ति शिवकी आराधना कर ली गयी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९-३३१/२ ॥<br>सभीका उपकार करना तथा सबको अभय प्रदान करना अष्टमूर्ति शिवकी ही आराधना है; इसमें संशय नहीं है। सबका उपकार करना तथा सबपर कृपा करना—इसे मुनीश्वरोंने अष्टमूर्तिकी ही परम पूजा बतायी है। अतः [हे सनत्कुमार!] शिवकी प्रसन्नताकी कामना करनेवाले आपको अन्य सभी प्राणियोंपर अनुग्रह तथा उन्हें सर्वविध अभय प्रदान करना चाहिये॥ ३४-३७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाष्टमूर्तिवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाष्टमूर्तिवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

चौदहवाँ अध्याय

भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन

सनत्कुमार उवाच<br>पञ्च ब्रह्माणि मे नन्दिन्नाचक्ष्व गणसत्तम।<br>श्रेयःकरणभूतानि पवित्राणि शरीरिणाम्॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>शिवस्यैव स्वरूपाणि पञ्च ब्रह्माह्वयानि ते।<br>कथयामि यथातत्त्वं पद्मयोनेः सुतोत्तम॥ २<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकनिर्माता पञ्चब्रह्मात्मकः शिवः॥ ३<br>सर्वेषामेव लोकानां यदुपादानकारणम्।<br>निमित्तकारणं चाहुस्स शिवः पञ्चधा स्मृतः॥ ४<br>मूर्तयः पञ्च विख्याताः पञ्च ब्रह्माह्वयाः पराः।<br>सर्वलोकशरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ५<br>क्षेत्रज्ञः प्रथमा मूर्तिः शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भोक्ता प्रकृतिवर्गस्य भोग्यस्येशानसंज्ञितः॥ ६<br>स्थाणोस्तत् पुरुषाख्या च द्वितीया मूर्तिरुच्यते।<br>प्रकृतिः सा हि विज्ञेया परमात्मगुहात्मिका॥ ७सनत्कुमार बोले—हे गणोंमें श्रेष्ठ नन्दिन्! जीवोंके लिये कल्याणकारी तथा परम पवित्र पंचब्रह्मोंके विषयमें मुझे बताइये॥ १॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! मैं आपसे शिवजीके पंचब्रह्म नामक स्वरूपोंका यथार्थरूपमें वर्णन कर रहा हूँ। समस्त लोकोंके एकमात्र संहारक, सभी लोकोंके एकमात्र रक्षक तथा समग्र जगत्के एकमात्र स्रष्टा पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं॥ २-३॥<br>जिन्हें सभी लोकोंका उपादानकारण तथा निमित्तकारण कहा गया है, वे शिव पाँच भेदोंवाले बताये गये हैं। सभी लोकोंको शरण प्रदान करनेवाले परमात्मा शिवकी पंचब्रह्म नामक पाँच श्रेष्ठ मूर्तियाँ विख्यात हैं॥ ४-५॥<br>परमेष्ठी शिवकी पहली मूर्ति क्षेत्रज्ञ है, भोगके योग्य समस्त प्रकृतिवर्गका भोग करनेवाली वह मूर्ति 'ईशान' नामवाली है॥ ६॥<br>भगवान् शिवकी दूसरी मूर्तिको 'तत्पुरुष' नामसे कहा जाता है। उसे परमात्माकी गुहास्वरूपिणी प्रकृति ही समझना चाहिये॥ ७॥