श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १५] शिवमाहात्म्यका वर्णन ६३३
पन्द्रहवाँ अध्याय
शिवमाहात्म्यका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयोऽपि शिवमाहात्म्यं समाचक्ष्व महामते।<br>सर्वज्ञो ह्यसि भूतानामधिनाथ महागुण॥ १ ॥ | सनत्कुमार बोले— हे महामते! आप और भी शिवमाहात्म्यका वर्णन करें, हे प्राणियोंके अधिनाथ! हे महान् गुणोंवाले! आप सर्वज्ञ हैं॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>शिवमाहात्म्यमेकाग्रः शृणु वक्ष्यामि ते मुने।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः कीर्तितं मुनिसत्तमैः॥ २ ॥ | शैलादि बोले— हे मुने! अनेक श्रेष्ठ मुनियोंने अनेक प्रकारसे अपने शब्दोंमें शिवमाहात्म्यका वर्णन किया है; उसे मैं आपको बताऊँगा, आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये॥ २॥ |
| सदसद्रूपमित्याहुः सदसत्पतिरित्यपि।<br>तं शिवं मुनयः केचित्प्रवदन्ति च सूरयः॥ ३ ॥ | कुछ [गौतम आदि] मुनियोंने उन शिवको सत्-असत् रूपवाला कहा है और कुछ विद्वान् उन्हें सत्-असत्का पति भी कहते हैं॥ ३॥ |
| भूतभावविकारेण द्वितीयेन स उच्यते।<br>व्यक्तं तेन विहीनत्वादव्यक्तमसदित्युपि॥ ४ ॥<br><br>उभे ते शिवरूपे हि शिवादन्यं न विद्यते।<br>तयोः पतित्वाच्च शिवः सदसत्पतिरुच्यते॥ ५ ॥ | भूतोंके भाव आदि विकारोंसे मुक्त रहनेपर वे शिव व्यक्त तथा सत् कहे जाते हैं और उस [भाव आदि विकार]-से विहीन रहनेपर अव्यक्त तथा असत् कहे जाते हैं। सत् तथा असत्—वे दोनों ही शिवके रूप हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। उन दोनोंका पति होनेके कारण शिव सदसत्पति (सत् तथा असत्के पति) कहे जाते हैं॥ ४-५॥ |
| क्षराक्षरात्मकं प्राहुः क्षराक्षरपरं तथा।<br>शिवं महेश्वरं केचिन्मुनयस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ६ ॥<br><br>उक्तमक्षरमव्यक्तं व्यक्तं क्षरमुदाहृतम्।<br>रूपे ते शङ्करस्यैव तस्मान्न पर उच्यते॥ ७ ॥ | कुछ तत्त्वचिन्तक मुनियोंने महेश्वर शिवको क्षर-अक्षररूप तथा क्षर-अक्षरसे परे भी कहा है। अव्यक्तको अक्षर कहा गया है और व्यक्तको क्षर कहा गया है। वे दोनों रूप शिवके ही हैं, क्षराक्षररूप होनेके कारण वे शिव अपरस्वरूप कहे जाते हैं॥ ६-७॥ |
| तयोः परः शिवः शान्तः क्षराक्षरपरो बुधैः।<br>उच्यते परमार्थेन महादेवो महेश्वरः॥ ८ ॥<br><br>समस्तव्यक्तरूपं तु ततः स्मृत्वा स मुच्यते। | तत्त्वज्ञानी विद्वान् उन दोनों (व्यक्त तथा अव्यक्त)-से परे होनेके कारण उन शान्त महेश्वर महादेव शिवको क्षराक्षरपर (क्षर तथा अक्षरसे परे) कहते हैं। वह जीव समस्तप्राणिस्वरूप शिवका स्मरण करके मुक्त हो जाता है। |
| समष्टिव्यष्टिरूपं तु समष्टिव्यष्टिकारणम्॥ ९ ॥<br><br>वदन्ति केचिदाचार्याः शिवं परमकारणम्।<br>समष्टिं विदुरव्यक्तं व्यष्टिं व्यक्तं मुनीश्वराः॥ १० ॥<br><br>रूपे ते गदिते शम्भोर्नास्त्यन्यद्वस्तुसम्भवम्।<br>तयोः कारणभावेन शिवो हि परमेश्वरः॥ ११ ॥ | कुछ आचार्य परमकारण शिवको समष्टि-व्यष्टिरूप और समष्टि-व्यष्टिका कारण भी कहते हैं। मुनीश्वरोंने अव्यक्तको समष्टि तथा व्यक्तको व्यष्टि कहा है। वे दोनों रूप शिवके ही कहे गये हैं; इसके अतिरिक्त अन्य वस्तु सम्भव नहीं है। योगशास्त्रको जाननेवाले लोग [समष्टि-व्यष्टि] इन दोनोंका ही कारण होनेसे परमेश्वर |