भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| | नेत्रपुटोंसे पान करें। फलतः अर्धनारीश्वर भगवान् शिवके दर्शनसे मुक्त हो जायें। शिवज्योतिको प्राप्तकर दिग्जयी कामादिको हम नहीं जानते; क्योंकि हम शिवाराधकोंका ये कामक्रोधादि शत्रु क्या करेंगे और मरणधर्मा इस शरीरादिकी मृत्यु या अमरतासे भी क्या प्रयोजन ? ॥ ७ ॥ | | एतज्जगद्धितं दिव्यमक्षरं सूक्ष्ममव्ययम्॥ ८<br>प्राजापत्यं पवित्रं च सौम्यमग्राह्यमव्ययम्।<br>अग्राह्येणापि वा ग्राह्यं वायव्येन समीरणः॥ ९<br>सौम्येन सौम्यं ग्रसति तेजसा स्वेन लीलया।<br>तस्मै नमोऽपसंहर्त्रे महाग्रासाय शूलिने॥ १० | यह जगत् शिवरूप है, जो हितकारक, दिव्य, नाशरहित, सूक्ष्म तथा शाश्वत है। आप प्राजापत्य (सर्वजनक), पावन, शान्त, अग्राह्य, अविनाशी, वायुसम्बन्धी स्पर्शगुणके कारण वायुरूप और अग्राह्य मनसे भी ग्राह्य हैं। आप अपने चन्द्रतेजसे भक्तोंके अन्तःकरणको लीलापूर्वक अपनेमें विलीन कर लेते हैं। महत्तत्त्वको भी अपना ग्रास बना लेनेवाले अपसंहर्ता उन भगवान् शूलीको नमस्कार है॥ ८-१०॥ | | हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणे प्रतिष्ठिताः।<br>हृदि त्वमसि यो नित्यं तिस्रो मात्राः परस्तु सः॥ ११ | हृदयदेशमें विराजमान तीनों मात्राएँ तथा सभी देवता हृदयके अधिकरण—प्राणमें प्रतिष्ठित हैं। जो प्राणरूप आप सबके हृदयमें नित्य विराजमान हैं, वह नाद नामक अर्धमात्रारूप आप ही हैं॥ ११॥ | | शिरश्चोत्तरतश्चैव पादौ दक्षिणतस्तथा।<br>यो वै चोत्तरतः साक्षात्स ओङ्कारः सनातनः॥ १२ | उत्तरवर्ती शिरस्थानीय अकार, दक्षिणवर्ती पादस्थानीय मकार, मध्यवर्ती मध्यस्थ उकार, यह उत्तरवर्ती अकारसे संश्लिष्ट जो साक्षात् ॐकार है, वह सनातन शिव ही है॥ १२॥ | | ओङ्कारो यः स एवेह प्रणवो व्याप्य तिष्ठति।<br>अनन्तस्तारसूक्ष्मं च शुक्लं वैद्युतमेव च॥ १३<br>परं ब्रह्म स ईशान एको रुद्रः स एव च।<br>भवान् महेश्वरः साक्षान्महादेवो न संशयः॥ १४ | यहाँ यह जो ॐ है, वही प्रणव सर्वव्यापी है [सबको व्याप्त करके रहता है]। अनन्त, तारक, सूक्ष्म, शुक्ल, ज्योतिर्मय, परब्रह्म ईशान अद्वितीय रुद्र भगवान् महेश्वर साक्षात् महादेव हैं, इसमें संशय नहीं है॥ १३-१४॥ | | ऊर्ध्वमुन्नामयत्येव स ओङ्कारः प्रकीर्तितः।<br>प्राणानवति यस्तस्मात्प्रणवः परिकीर्तितः॥ १५ | यह उच्चारण करते ही सारे शरीरको ऊपरकी ओर खींचता है, अतः इसे ओंकार कहा जाता है और प्राणोंकी रक्षा करता है, अतः प्रणव कहलाता है। | | सर्वं व्याप्नोति यस्तस्मात्सर्वव्यापी सनातनः।<br>ब्रह्मा हरिश्च भगवानाद्यन्तं नोपलब्धवान्॥ १६ | यह चराचर जगत्को व्याप्त करता है, इसलिये सर्वव्यापी सनातन कहा जाता है। ब्रह्मा, षडैश्वर्यवान् हरि तथा अन्य इन्द्रादिक भी इसके आदि और अन्तको न पा सके। | | तथान्ये च ततोऽनन्तो रुद्रः परमकारणम्।<br>यस्तारयति संसारात्तार इत्यभिधीयते॥ १७ | अतः इन परम कारण रुद्रको अनन्त कहा जाता है। ये संसारसे तारते हैं, अतः तार कहे जाते हैं। |