भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६४३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं तमाहुर्वै रुद्रं शाश्वतं परमेश्वरम्।<br>परात्परतरं वापि परात्परतरं ध्रुवम्॥ ४१<br>ब्रह्मणो जनकं विष्णोर्वह्नेर्वायोः सदाशिवम्।<br>ध्यात्वाग्निना च शोध्याङ्गं विशोध्य च पृथक्पृथक्॥ ४२<br>पञ्चभूतानि संयम्य मात्राविधिगुणक्रमात्।<br>मात्राः पञ्च चतस्रश्च त्रिमात्राद्विस्ततः परम्॥ ४३<br>एकमात्रममात्रं हि द्वादशान्ते व्यवस्थितम्।<br>स्थित्वा स्थाप्यामृतो भूत्वा व्रतं पाशुपतं चरेत्॥ ४४उन्हीं एकमात्र रुद्रको शाश्वत, परमेश्वर, परात्परतरसे भी परात्परतर तथा ध्रुव कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि तथा वायुके जनक सदाशिवका ध्यान करके, अग्निबीज (रं)-से देहका शोधन करके पृथक्-पृथक् पंचभूतोंका विशोधन पुनः मात्राविधि-गुणके क्रमसे पाँच-चार-तीन-दो-एक—इन तन्मात्राओंका संयमन करके द्वादशारचक्रके अन्तमें विराजमान निर्गुण शिवको स्थापित करके तथा स्वयं वहाँ स्थित होकर अमृतरूप होकर पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ ४१-४४॥
एतद्व्रतं पाशुपतं चरिष्यामि समासतः।<br>अग्निमाधाय विधिवदृग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४५<br>उपोषितः शुचिः स्नातः शुक्लाम्बरधरः स्वयम्।<br>शुक्लयज्ञोपवीती च शुक्लमाल्यानुलेपनः॥ ४६<br>जुहुयाद्विरजो विद्वान् विरजाश्च भविष्यति।मैं इस पाशुपतव्रतको संक्षेपमें करूँगा—ऐसा संकल्प करके ऋक्, यजुः, सामके मन्त्रोंसे विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके, उपवासपूर्वक स्नान करके शुद्ध होकर शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, शुक्ल माला, शुक्ल चन्दन आदि धारण करके रजोगुणसे मुक्त होकर विद्वान् होम करे; इस प्रकार वह रजोगुणरहित हो जायगा॥ ४५-४६ १/२॥
वायवः पञ्च शुध्यन्तां वाङ्मनश्चरणायः॥ ४७<br>श्रोत्रं जिह्वा ततः प्राणस्ततो बुद्धिस्तथैव च।<br>शिरः पाणिस्तथा पार्श्वं पृष्ठोदरमनन्तरम्॥ ४८<br>जङ्घे शिश्नमुपस्थं च पायुर्मेढ्रं तथैव च।<br>त्वचा मांसं च रुधिरं मेदोऽस्थीनि तथैव च॥ ४९<br>शब्दः स्पर्शं च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>भूतानि चैव शुध्यन्तां देहे मेदादयस्तथा॥ ५०<br>अन्नं प्राणे मनो ज्ञानं शुध्यन्तां वै शिवेच्छया।<br>हुत्वाज्येन समिद्भिश्च चरुणा च यथाक्रमम्॥ ५१<br>उपसंहृत्य रुद्राग्निं गृहीत्वा भस्म यत्नतः।<br>अग्निरित्यादिना धीमान् विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्॥ ५२शिवकी इच्छासे [मेरे प्राण आदि] पाँचों वायु शुद्ध हों, वाणी, मन, पाद, कान, जिह्वा, प्राण, बुद्धि, सिर, हाथ, पार्श्वभाग, पृष्ठभाग, उदर, दोनों जाँघें, शिश्न, जननेन्द्रिय, गुदा, मेढ्र, त्वचा, मांस, रुधिर, मेद, अस्थियाँ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथ्वी आदि [पंच] महाभूत तथा देहमें स्थित मेद आदि शुद्ध हों; अन्न, प्राण, मन तथा ज्ञान शुद्ध हों—इस प्रकार यथाक्रम आज्य (घृत), समिधा तथा चरुसे विरजाहोम करके रुद्राग्निका उपसंहरणकर यत्नपूर्वक 'अग्निरिति' मन्त्रसे भस्म ग्रहणकर उसे मल करके बुद्धिमान्को अंगोंमें लगाना चाहिये॥ ४७-५२॥
एतत्पाशुपतं दिव्यं व्रतं पाशविमोचनम्।<br>ब्राह्मणानां हितं प्रोक्तं क्षत्रियाणां तथैव च॥ ५३<br>वैश्यानामपि योग्यानां यतीनां तु विशेषतः।<br>वानप्रस्थाश्रमस्थानां गृहस्थानां सतामपि॥ ५४<br>विमुक्तिर्विधिनानेन दृष्ट्वा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्॥ ५५<br>सोऽपि पाशुपतो विप्रो विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्।<br>भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान् महापातकसम्भवैः॥ ५६यह दिव्य पाशुपतव्रत बन्धनसे मुक्ति दिलानेवाला और ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, विशेषरूपसे योग्य (अदुष्ट तथा अपतित) यतियों, वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित रहनेवालों, सत्पुरुष गृहस्थों तथा ब्रह्मचारियोंके लिये हितकर कहा गया है, इस प्रकार विरजादीक्षासहित भस्म धारण करनेसे मुक्ति होती है—ऐसा जानकर 'अग्निरिति' इत्यादि मन्त्रसे अग्निहोत्रके भस्मको ग्रहण करके उसे मलकर अंगोंमें धारण करना चाहिये; ऐसा करनेवाला