श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| पुनराह महादेवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>मतिः स्मृतिर्बुद्धिरिति गायमानः पुनः पुनः॥ ८<br><br>एहोहीति महादेवि सातिष्ठत्प्राञ्जलिर्विभुम्।<br>विश्वमावृत्य योगेन जगत्सर्वं वशीकुरु॥ ९ | देवताओंके वन्दनीय महातेजस्वी महादेवने 'तुम मति हो, बुद्धि हो तथा स्मृति हो'—इस रूपमें उस धेनुकी महिमाका बार-बार गान करते हुए कहा—हे महादेवि! आओ, आओ; और सम्पूर्ण जगत्को योगके द्वारा आवृत करके अपने वशमें करो। इस प्रकार कहनेपर वह धेनु हाथ जोड़कर सर्वसमर्थ महादेवके सम्मुख खड़ी हो गयी॥ ७-९॥ |
| अथ तामाह देवेशो रुद्राणी त्वं भविष्यसि।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय परमार्था भविष्यसि॥ १० | इसके अनन्तर देवेश्वर महादेवने उससे कहा—तुम रुद्राणी होओगी और ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये परमार्थसाधिका बनोगी॥ १०॥ |
| तथैनां पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः।<br>प्रददौ देवदेवेशः चतुष्पादां जगद्गुरुः॥ ११<br><br>ततस्तां ध्यानयोगेन विदित्वा परमेश्वरीम्।<br>ब्रह्मा लोकगुरोः सोऽथ प्रतिपेदे महेश्वरीम्॥ १२ | ऐसा कहकर देवाधिदेव जगद्गुरु महादेवने पुत्रकी कामनासे ध्यानरत ब्रह्माजीको वह चतुष्पाद गाय दे दी। तदनन्तर ध्यानयोगसे उस धेनुको परमेश्वरी जानकर ब्रह्माजीने जगद्गुरु महादेवसे वह माहेश्वर धेनु प्राप्त कर ली॥ ११-१२॥ |
| गायत्रीं तु ततो रौद्रीं ध्यात्वा ब्रह्मानुयन्त्रितः।<br>इत्येतां वैदिकीं विद्यां रौद्रीं गायत्रीमीरिताम्॥ १३<br><br>जपित्वा तु महादेवीं ब्रह्मा लोकनमस्कृताम्।<br>प्रपन्नस्तु महादेवं ध्यानयुक्तेन चेतसा॥ १४ | ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर रौद्री गायत्रीका ध्यान करके और रौद्री गायत्रीके रूपमें कथित इस वेदप्रतिपादित, ज्ञानदायिनी, विद्यास्वरूपिणी तथा लोकवन्द्या महादेवी (धेनु)-का ध्यानयुक्त मनसे जप करके महादेवके शरणागत हुए॥ १३-१४॥ |
| ततस्तस्य महादेवो दिव्ययोगं बहुश्रुतम्।<br>ऐश्वर्यं ज्ञानसम्पत्तिं वैराग्यं च ददौ प्रभुः॥ १५ | तत्पश्चात् परमेश्वर महादेवने उन ब्रह्माजीको दिव्य योग, महान् कीर्ति, ऐश्वर्य, ज्ञानसम्पदा तथा वैराग्य प्रदान किया॥ १५॥ |
| ततोऽस्य पार्श्वतो दिव्याः प्रादुर्भूताः कुमारकाः।<br>पीतमाल्याम्बरधराः पीतस्रगनुलेपनाः॥ १६<br><br>पीताभोष्णीषशिरसः पीतास्याः पीतमूर्धजाः।<br>ततो वर्षसहस्रान्त उषित्वा विमलौजसः॥ १७ | इसके बाद तत्पुरुषसंज्ञक उन महादेवके समीप दिव्य कुमार प्रकट हुए, जो पीले रंगकी माला तथा वस्त्र धारण किये हुए थे और पीले रंगके गन्धका अनुलेपन किये हुए थे। उनके सिरपर पीले रंगकी पगड़ी थी। उनके मुख तथा बाल भी पीतवर्णके थे॥ १६ १/२॥ |
| योगात्मानस्तपोह्लादाः ब्राह्मणानां हितैषिणः।<br>धर्मयोगबलोपेता मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्॥ १८<br><br>उपदिश्य महायोगं प्रविष्टास्ते महेश्वरम्।<br>एवमेतेन विधिना ये प्रपन्ना महेश्वरम्॥ १९ | तदनन्तर विमल ओजसे युक्त, योगात्मा, तपस्यामें ही आह्लादित रहनेवाले, ब्राह्मणोंके हितैषी तथा धर्म एवं योगबलसे सम्पन्न वे कुमार एक हजार वर्षतक उन तत्पुरुष महादेवके समीप निवास करके यज्ञ करनेवाले मुनियोंको महायोगका उपदेश प्रदानकर महेश्वरमें समाविष्ट हो गये॥ १७-१८ १/२॥<br>इसी विधिसे अन्य जो भी लोग नियतात्मा, |