भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 662
६६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| | अभिमन्त्रित करके मूल मन्त्रसे बायें हाथका स्पर्श करे। दस बार छठे मन्त्रके उच्चारणसे दिग्बन्ध करना बताया गया है॥ २–४॥ | | वामेन तीर्थं सव्येन शरीरमनुलिप्य च।<br>स्नात्वा सर्वैः स्मरन् भानुमभिषेकं समाचरेत्॥ ५<br><br>शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशेन दलेन वा।<br>सौरैरेभिश्च विविधैः सर्वसिद्धिकरैः शुभैः॥ ६<br><br>सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्वदेवेषु सारभूतानि सर्वतः॥ ७ | बायें हाथसे तीर्थ (जल)-का स्पर्श करके दायें हाथसे शरीरका अनुलेप करके सभी मन्त्रोंसे पुनः स्नान करनेके बाद सूर्यका स्मरण करते हुए शृंगसे, पत्तोंकी दोनियोंसे अथवा पलाशके पत्तेसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले तथा मंगलकारी विविध सौरमन्त्रोंसे अभिषेक करना चाहिये। हे सुव्रत! अब मैं सभी देवमन्त्रोंमें सारस्वरूप सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको सम्यक् प्रकारसे बताऊँगा॥ ५–७॥ | | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकानि ऋतमक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिन्नमोऽन्तकम्॥ ८ | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नवाक्षरमय मन्त्र बाष्कल मन्त्र कहा गया है। भूः आदि सातों लोक प्रलयपर्यन्त नष्ट नहीं होते, अतः उन्हें ऋत [अक्षर] कहा जाता है। सत्य (ब्रह्म) अक्षर (नाशशून्य) है, इस प्रकार प्रणवादि नमःपर्यन्त बाष्कल मन्त्र है॥ ८॥ | | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ ९<br><br>मूलमन्त्रमिदं प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्तास्यं मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ १०<br><br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि यथाक्रमम्।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन च मध्यमम्॥ ११<br><br>ॐ भूः ब्रह्महृदयाय ॐ भुवः विष्णुशिरसे ॐ स्वः रुद्रशिखायै ॐ भूर्भुवः स्वःज्वालामालिनीशिखायै ॐ महः महेश्वराय कवचाय ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्।<br><br>मन्त्राणि कथितान्येवं सौराणि विविधानि च।<br>एतैः शृङ्गादिभिः पात्रैः स्वात्मानमभिषेचयेत्॥ १२<br><br>ताम्रकुम्भेन वा विप्रः क्षत्रियो वैश्य एव च।<br>सकुशेन सपुष्पेण मन्त्रैः सर्वैः समाहितः॥ १३ | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि॥ धियो यो नः प्रचोदयात्॥ ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह मन्त्र परमात्मा सूर्यका मूल मन्त्र कहा गया है। नवाक्षर मन्त्रसे तथा मूल मन्त्रसे तेजोमुख सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। अब मैं क्रमसे अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्महृदयाय, ॐ भुवः विष्णुशिरसे, ॐ स्वः रुद्रशिखायै, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिनीशिखायै, ॐ महः महेश्वराय कवचाय, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः, ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्—ये विविध सौरमन्त्र कहे गये हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यको समाहित होकर शृंग आदि पात्रोंसे अथवा कुश तथा पुष्पयुक्त ताम्रकुम्भसे इन सभी मन्त्रोंके द्वारा अपना अभिषेक करना चाहिये॥ ९–१३॥ | | रक्तवस्त्रपरीधानः स्वाचामेद्विधिपूर्वकम्।<br>सूर्यश्चेति दिवारात्रौ चाग्निश्चेति द्विजोत्तमः॥ १४ | इसके बाद श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि रक्तवर्णका |