श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| शिवपूजां ततः कुर्याद्धर्मकामार्थसिद्धये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं यजनं भास्करस्य च॥ ७९ | उपसंहार करके अपने हृदयकमलमें विसर्जन करके तथा नमस्कार करनेके अनन्तर धर्म-कामकी सिद्धिके लिये शिवपूजा करनी चाहिये। इस प्रकार संक्षेपमें सूर्यपूजन कहा गया॥ ७६-७९॥ | | यः सकृद्वा यजेद्देवं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>भास्करं परमात्मानं स याति परमां गतिम्॥ ८०<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापविवर्जितः।<br>सर्वैश्वर्यसमोपेतस्तेजसाप्रतिमश्च सः॥ ८१<br><br>पुत्रपौत्रादिमित्रैश्च बान्धवैश्च समन्ततः।<br>भुक्त्वाैव विपुलान् भोगानिहैव धनधान्यवान्॥ ८२<br><br>यानवाहनसम्पन्नो भूषणैर्विविधैरपि।<br>कालं गतोऽपि सूर्येण मोदते कालमक्षयम्॥ ८३<br><br>पुनस्तस्मादिहागत्य राजा भवति धार्मिकः।<br>वेदवेदाङ्गसम्पन्नो ब्राह्मणो वात्र जायते॥ ८४<br><br>पुनः प्राग्वासनायोगाद्धार्मिको वेदपारगः।<br>सूर्यमेव समभ्यर्च्य सूर्यसायुज्यमाप्नुयात्॥ ८५ | जो [मनुष्य] देवदेव जगद्गुरु परमात्मा भास्करका एक बार भी यजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। वह पूर्णरूपसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, सभी पापोंसे रहित हो जाता है, सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो जाता है और अप्रतिम तेजस्वी हो जाता है। वह पुत्र, पौत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धव, धन-धान्य, यान-वाहन, भूषण आदिसे सम्पन्न होकर इस लोकमें विपुल सुखोंका सम्यक् भोग करके मृत्युको प्राप्त होनेपर सूर्यके साथ अनन्त कालतक आनन्द प्राप्त करता है। पुनः वहाँसे इस लोकमें जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है अथवा वेदवेदांगसे सम्पन्न ब्राह्मण होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्मके दृढ़ संस्कारके कारण धर्मपरायण तथा वेदमें पारंगत वह मनुष्य भगवान् सूर्यकी ही भलीभाँति उपासना करके सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है॥ ८०-८५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तत्त्वशुद्धिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः॥ २२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तत्त्वशुद्धिवर्णन' नामक बाइसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥
तेईसवाँ अध्याय
हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
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| अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि शिवार्चनमनुत्तमम्।<br>त्रिसन्ध्यमर्चयेदीशमग्निकार्यं च शक्तितः॥ १ | हे सनत्कुमार! अब मैं आपको अत्युत्तम शिव-पूजनकी विधि बताऊँगा। तीनों कालोंमें भगवान् महेश्वरका पूजन करना चाहिये और सामर्थ्यानुसार हवन भी करना चाहिये॥ १॥ |
| शिवस्नानं पुरा कृत्वा तत्त्वशुद्धिं च पूर्ववत्।<br>पुष्पहस्तः प्रविश्याथ पूजास्थानं समाहितः॥ २<br><br>प्राणायामत्रयं कृत्वा दाहनाप्लावनानि च।<br>गन्धादिवासितकरो महामुद्रां प्रविन्यसेत्॥ ३ | सर्वप्रथम शिवस्नान करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करे और हाथमें पुष्प आदि लेकर पूजास्थानमें प्रवेश करके समाहितचित्त हो तीन प्राणायाम करके दाहन, आप्लावन आदि शुद्धि करके गन्ध आदिसे हाथोंको सुगन्धित करके [योगशास्त्रमें कही गयी] महामुद्राकी रचना करनी चाहिये॥ २-३॥ |
| विज्ञानेन तनुं कृत्वा ब्रह्माग्नेरपि यत्नतः।<br>अव्यक्तबुद्ध्यहङ्कारतन्मात्रासम्भवां तनुम्॥ ४ | अव्यक्त, बुद्धि, अहंकार तथा पंचतन्मात्राओंसे |