श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६६९
| शुद्धदीपशिखाकारं भावयेद्भवनाशनम्।<br><br>लिङ्गे च पूजयेद्देवं स्थण्डिले वा सदाशिवम्॥ ३१ | स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक समस्त कृत्य सम्पन्न करके अपने हृदयकमलमें शुद्ध दीपशिखाके आकारवाले भवनाशक शिवकी भावना करनी चाहिये और शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें प्रभु सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये॥ २५—३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवार्चनविधिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवार्चनविधिवर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य
| शैलादिरुवाच<br>व्याख्यां पूजाविधानस्य प्रवदामि समासतः।<br>शिवशास्त्रोक्तमार्गेण शिवेन कथितं पुरा॥ १ | शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] मैं शिवशास्त्रमें कही गयी रीतिसे शिवपूजा-विधिका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, जिसे पूर्व कालमें स्वयं शिवजीने कहा था॥ १॥ |
| अथोभौ चन्दनचर्चितौ हस्तौ वौषडन्तेनाद्यञ्जलिं<br>कृत्वा मूर्तिविद्याशिवादीनि जप्त्वा अङ्गुष्ठादि-<br>कनिष्ठिकान्तं ईशानाद्यं कनिष्ठिकादिमध्यमान्तं<br>हृदयादितृतीयान्तं तुरीयमङ्गुष्ठेनानामिकया पञ्चमं<br>तलद्वयेन षष्ठं तर्जन्यङ्गुष्ठाभ्यां नाराचास्त्रप्रयोगेण<br>पुनरपि मूलं जप्त्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य<br>शिवहस्तमित्युच्यते॥ २<br><br>शिवार्चना तेन हस्तेन कार्या॥ ३ | [शिवस्नान और भस्मस्नानके पश्चात्] दोनों हाथोंको चन्दनसे चर्चित करके अन्तमें 'वौषट्' से युक्त मूलमन्त्रके द्वारा अंजलि बाँधकर मूर्ति, विद्या और अंगमन्त्रोंका जप करके अँगुष्ठसे कनिष्ठिकापर्यन्त ईशान आदि पाँच मन्त्रोंका न्यास करे। [न्यासक्रम इस प्रकार है—] पूर्वोक्त अंगमन्त्रोंमेंसे सद्योजातसे लेकर तीसरे अघोर मन्त्रोंका कनिष्ठिका, तर्जनी और मध्यमामें न्यास करे; चौथे मन्त्र (तत्पुरुषमन्त्र)-का अंगुष्ठमें और पाँचवें मन्त्रका अनामिकामें और छठे मन्त्रका दोनों हाथोंके दोनों तलोंमें न्यास करे। इसके पश्चात् तर्जनी तथा अंगुष्ठके योगसे नाराच अस्त्र मुद्रा बनाये और फिर मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-का जप करके चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करे; इसे ही शिवहस्त कहा जाता है, उसी हाथसे शिवपूजन करना चाहिये॥ २-३॥ |
| तत्त्वगतमात्मानं व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्ववत्॥ ४<br><br>क्ष्माम्भोऽग्निवायुव्योमान्तं पञ्चचतुःशुद्धकोट्यन्ते<br>धारासहितेन व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्वं कुर्यात्॥ ५ | तत्त्वोंमें विद्यमान आत्माको व्यवस्थित करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशपर्यन्त पंचकोशोंका अतिक्रमण करके अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और ब्रह्मका भी उल्लंघनकर शुद्धकोटि (ब्रह्म)-के समीप अमृतधारासहित सुषुम्णा मार्गसे अपनी आत्माको स्थापित करके सर्वप्रथम |