श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 678, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 678
| ६७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपत्रं सकर्णिकम्।<br>प्रादेशमात्रं विधिना कारयेद्ब्रह्मणः सुत॥ ५<br><br>षष्ठेनोल्लेखनं प्रोक्तं प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम्।<br>नेत्रेणालोक्य वै कुण्डं षड्रेखाः कारयेद्बुधः॥ ६<br><br>प्रागायतेन विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>उत्तराग्राः शिवा रेखाः प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः॥ ७ | हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! कुण्डके मध्यमें नाभि होनी चाहिये; उसे विधिपूर्वक अष्टदलीय, कर्णिकायुक्त और प्रादेशमात्र प्रमाणकी निर्मित करानी चाहिये। अस्त्रमन्त्रसे उल्लेखन करना कहा गया है तथा कवचमन्त्रसे प्रोक्षण करना बताया गया है; बुद्धिमान्को चाहिये कि कुण्डको नेत्रमन्त्रसे देखकर छः रेखाएँ बनाये। हे विप्रेन्द्र! पूर्वाग्र तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरस्वरूप हैं और उत्तराग्र रेखाएँ शिवस्वरूप हैं। इसके बाद कवचमन्त्रसे पुनः प्रोक्षण करना चाहिये॥ ५-७॥ |
| शमीपिप्पलसम्भूतामरणीं षोडशाङ्गुलाम्।<br>मथित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यासं हृदैव तु॥ ८<br><br>प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमन्वाधाय यथाविधि।<br>तूष्णीं प्रादेशमात्रैस्तु याज्ञिकैः शकलैः शुभैः॥ ९<br><br>परिसम्मोहनं कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै।<br>परिस्तीर्य विधानेन प्रागाद्येवमनुक्रमात्॥ १०<br><br>उत्तराग्रं पुरस्ताद्धि प्रागग्रं दक्षिणे पुनः।<br>पश्चिमे चोत्तराग्रं तु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु॥ ११ | शमीगर्भस्थ पीपलके काष्ठकी बनी हुई सोलह अँगुल प्रमाणकी अरणीद्वारा वह्निबीज (रं)-से मन्थन करके और हृदयमन्त्रसे शक्तिन्यास करके अग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। इसके बाद मौन होकर विधिपूर्वक उसे अग्निकुण्डमें रख देना चाहिये। विधानके अनुसार अग्न्याधान करके शान्तिपूर्वक प्रादेशप्रमाणके यज्ञसम्बन्धी शुभ काष्ठकी समिधाओंको उसपर प्राक् आदिके क्रमसे विधिपूर्वक व्यवस्थित करके जलके द्वारा आठों दिशाओंमें परिसम्मोहन करना चाहिये। पूरबमें उत्तराग्र, दक्षिणमें पूर्वाग्र, पश्चिममें उत्तराग्र और उत्तरमें पूर्वाग्र कुश बिछाना चाहिये॥ ८-११॥ |
| ऐन्द्रे चैन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते।<br>सौम्यस्योपरि चान्द्राग्नं वारुणाग्नमधस्ततः॥ १२<br><br>द्वन्द्वरूपेण पात्राणि बर्हिष्वासाद्य सुव्रत।<br>अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे॥ १३<br><br>तस्योपरि न्यसेद्दर्भाञ्छिवं दक्षिणतो न्यसेत्।<br>पूजयेन्मूलमन्त्रेण पश्चाद्धोमं समाचरेत्॥ १४ | पूर्व दिग्भागमें इन्द्राग्निदैवतका आवाहन करके दक्षिण दिग्भागमें यामाग्नि, उत्तर दिग्भागमें चन्द्राग्नि और इसके बाद पश्चिम दिग्भागमें वारुणाग्निका आवाहन किया जाता है। हे सुव्रत! पात्रोंको द्वन्द्वरूपमें अधोमुख करके कुशाओंपर रखकर तथा सभी द्रव्योंको उत्तर भागमें रखकर उसके ऊपर कुशोंको रख देना चाहिये। दक्षिण भागमें शिवको स्थापित करना चाहिये; इसके बाद मूलमन्त्रसे पूजन करना चाहिये, तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करना चाहिये॥ १२-१४॥ |
| प्रोक्षणीपात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदकोपरि॥ १५<br><br>प्लावयेच्च कुशाग्रं तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः।<br>विकीर्य सर्वपात्राणि सुसम्प्रोक्ष्य विधानतः॥ १६<br><br>प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>अन्योदककुशाग्रैस्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत॥ १७ | तदनन्तर प्रोक्षणीपात्र लेकर उसे जलसे भर देना चाहिये और फिर प्रादेशप्रमाणके दो कुशोंको जलके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। अग्नि तथा सूर्यकी किरणोंसे कुशाग्रको प्लावित करना चाहिये। तदनन्तर सभी पात्रोंको फैलाकर विधिपूर्वक प्रोक्षण करके प्रणीतापात्रको लेकर उसे पुनः जलसे पूर्ण करना |
1985 Lingamahapuran_Section_23_2_Back