भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 69
अध्याय १५ ]अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश६७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुर्गुणं बुद्धिपूर्वे क्रोधादष्टगुणं स्मृतम्।<br>वीरहा लक्षमात्रेण भ्रूणहा कोटिमभ्यसेत्॥ ८हे वत्स! उससे आधा जप करनेसे वाचिक पाप तथा उससे भी आधे जपसे मानसिक पाप, चार गुना जप करनेसे बुद्धिपूर्वक अर्थात् जानबूझकर किये गये पाप तथा आठ गुना जप करनेसे क्रोधपूर्वक किये गये पाप दूर होते हैं॥ ७ १/२॥
मातृहा नियुतं जप्त्वा शुद्ध्यते नात्र संशयः।<br>गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च स्त्रीघ्नः पापयुतो नरः॥ ९वीरोंकी हत्या करनेवालेको एक लाख जप तथा भ्रूण-हत्या करनेवालेको एक करोड़ जप करना चाहिये। माताका हत्यारा दस लाख जप करनेसे शुद्ध होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ८ १/२॥
अयुताघोरमभ्यस्य मुच्यते नात्र संशयः।<br>सुरापो लक्षमात्रेण बुद्ध्याबुद्ध्यापि वै प्रभो॥ १०गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न तथा स्त्रीका हत्यारा—ऐसा पापी मनुष्य दस हजार बार अघोरमन्त्र जपकर पापमुक्त हो जाता है; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ९ १/२॥
मुच्यते नात्र सन्देहस्तदर्धेन च वारुणीम्।<br>अस्नाताशी सहस्रेण अजपी च तथा द्विजः॥ ११हे प्रभो! जानकर अथवा बिना जाने सुरापान करनेवाला एक लाख जपसे तथा वारुणी (मद्य) पीनेवाला उसके आधे अर्थात् पचास हजार जपसे पापमुक्त हो जाता है; इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है॥ १० १/२॥
अहुताशी सहस्रेण अदाता च विशुद्ध्यति।<br>ब्राह्मणस्वापहर्ता च स्वर्णस्तेयी नराधमः॥ १२बिना स्नान किये भोजन करनेवाला, गायत्री-जप तथा अग्निहोत्र किये बिना और देवताओं एवं अतिथियों आदिको भोजन कराये बिना भोजन करनेवाला द्विज एक हजार जप करनेसे शुद्ध होता है॥ ११ १/२॥
नियुतं मानसं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः।<br>गुरुतल्परो वापि मातृघ्नो वा नराधमः॥ १३ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला तथा स्वर्णकी चोरी करनेवाला अधम व्यक्ति दस लाख अघोर मन्त्र जपकर पापसे मुक्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। इसी प्रकार
ब्रह्मघ्नश्च जपेदेवं मानसं वै पितामह।<br>सम्पर्कात्पापिनां पापं तत्समं परिभाषितम्॥ १४हे पितामह! गुरुपत्नीमें आसक्ति रखनेवाले, माताका वध करनेवाले तथा ब्रह्महत्यारे नराधमको भी [पापमुक्तिहेतु] दस लाख मानस जप करना चाहिये॥ १२-१३ १/२॥
तथाप्ययुतमात्रेण पातकाद्वै प्रमुच्यते<br>संसर्गात्पातकी लक्षं जपेद्वै मानसं धिया॥ १५पापियोंके सम्पर्कमात्रसे लगनेवाला पाप उन पापियोंके पापके ही समान कहा गया है, फिर भी मात्र दस हजार जपसे ही सम्पर्कमें रहनेवाला प्राणी उस पापसे मुक्त हो जाता है॥ १४ १/२॥
उपांशु यच्चतुर्धा वै वाचिकं चाष्टधा जपेत्।<br>पातकादर्धमेव स्यादुपपातकिनां स्मृतम्॥ १६संसर्गसे होनेवाले पाप-शमनके लिये पातकीको एक लाख मानस जप अथवा उसका चार गुना उपांशु जप अथवा आठ गुना वाचिक जप बुद्धिपूर्वक करना
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