श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 695, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 695
अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मध्य कामावसायित्वका पूजन करना चाहिये। यह द्वितीय आवरणपूजन मैंने कह दिया, अब तृतीय आवरणपूजनके विषयमें सुनिये॥ ५१—५९॥ | |
| शक्तयस्तु चतुर्विंशत्प्रधानकलशेषु च।<br>पूजयेद्व्यूहमध्ये तु पूर्ववद्विधिपूर्वकम्॥ ६०<br><br>दीक्षां दीक्षायिकां चैव चण्डां चण्डांशुनायिकाम्।<br>सुमतिं सुमत्यायीं च गोपां गोपायिकां तथा॥ ६१<br><br>अथ नन्दं च नन्दायीं पितामहमतः परम्।<br>पितामहार्यीं पूर्वाद्यं विधिना स्थाप्य पूजयेत्॥ ६२ | प्रधान कलशों (अष्ट दिक्पाल-कलशों)-में चौबीस शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। व्यूहके मध्य द्वितीय व्यूहकी भाँति सोलह शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उनके अतिरिक्त दीक्षा, दीक्षायिका, चण्डा, चण्डांशुनायिका, सुमति, सुमत्यायी, गोपा तथा गोपायिका—इन आठ शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उक्त चौबीस शक्तियोंकी पूजाके अनन्तर नन्द-नन्दायी, पितामह-पितामहायी—इनकी पूर्व आदि दिशाओंमें विधिपूर्वक स्थापना करके पूजा करनी चाहिये॥ ६०–६२॥ |
| एवं सम्पूज्य विधिना तृतीयावरणं शुभम्।<br>सौभद्रं व्यूहमासाद्य प्रथमावरणे क्रमात्॥ ६३<br><br>प्रागाद्यं विधिना स्थाप्य शक्त्यष्टकमनुक्रमात्।<br>द्वितीयावरणे चैव प्रागाद्यं शृणु शक्तयः॥ ६४<br><br>षोडशैव तु अभ्यर्च्य पद्ममुद्रां तु दर्शयेत्।<br>बिन्दुका बिन्दुगर्भा च नादिनी नादगर्भजा॥ ६५<br><br>शक्तिका शक्तिगर्भा च परा चैव परापरा।<br>प्रथमावरणेऽष्टौ च शक्तयः परिकीर्तिताः॥ ६६<br><br>चण्डा चण्डमुखी चैव चण्डवेगा मनोजवा।<br>चण्डाक्षी चण्डनिर्घोषा भृकुटी चण्डनायिका॥ ६७<br><br>मनोत्सेधा मनोध्यक्षा मानसी माननायिका।<br>मनोहरी मनोह्लादी मनःप्रीतिर्महेश्वरी॥ ६८<br><br>द्वितीयावरणे चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः।<br>सौभद्रः कथितो व्यूहो भद्रं व्यूहं शृणुष्व मे॥ ६९ | इस प्रकार शुभ तृतीय आवरणकी विधिपूर्वक पूजा करके प्रथम आवरणमें सौभद्र व्यूहको प्राप्तकर आठ शक्तियोंको क्रमसे पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापितकर विधिवत् उनकी पूजा करनी चाहिये। अब द्वितीय आवरणमें प्रागाद्य शक्तियोंको सुनिये। इन सोलहोंका अर्चन करके पद्ममुद्रा दिखानी चाहिये। बिन्दुका, बिन्दुगर्भा, नादिनी, नादगर्भजा, शक्तिका, शक्तिगर्भा, परा तथा परापरा—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणमें कही गयी हैं। चण्डा, चण्डमुखी, चण्डवेगा, मनोजवा, चण्डाक्षी, चण्डनिर्घोषा, भृकुटी, चण्डनायिका, मनोत्सेधा, मनोध्यक्षा, मानसी, माननायिका, मनोहरी, मनोह्लादी, मनःप्रीति और महेश्वरी—ये सोलह शक्तियाँ द्वितीय आवरणमें बतायी गयी हैं। मैंने सौभद्रव्यूहका वर्णन कर दिया, अब भद्रव्यूहके विषयमें सुनिये॥ ६३—६९॥ |
| ऐन्द्री हौताशनी याम्या नैर्ऋती वारुणी तथा।<br>वायव्या चैव कौबेरी ऐशानी चाष्टशक्तयः॥ ७०<br><br>प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु।<br>हरिणी च सुवर्णा च काञ्चनी हाटकी तथा॥ ७१<br><br>रुक्मिणी सत्यभामा च सुभगा जम्बुनायिका।<br>वाग्भवा वाक्पथा वाणी भीमा चित्ररथा सुधीः॥ ७२<br><br>वेदमाता हिरण्याक्षी द्वितीयावरणे स्मृता।<br>भद्राख्यः कथितो व्यूहः कनकाख्यं शृणुष्व मे॥ ७३ | ऐन्द्री, हौताशनी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायव्या, कौबेरी तथा ऐशानी—ये आठ शक्तियाँ हैं। प्रथम आवरण बता दिया, अब द्वितीय आवरण सुनिये। हरिणी, सुवर्णा, कांचनी, हाटकी, रुक्मिणी, सत्यभामा, सुभगा, जम्बुनायिका, वाग्भवा, वाक्पथा, वाणी, भीमा, चित्ररथा, सुधी, वेदमाता तथा हिरण्याक्षी—ये द्वितीय आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं। भद्राख्य व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब कनक नामक व्यूहके विषयमें सुनिये॥ ७०–७३॥ |