श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव [ ६१
| एवं कृत्वा कृतघ्नोऽपि ब्रह्महा भ्रूणहा तथा।<br>वीरहा गुरुघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ २७<br><br>स्तेयी सुवर्णस्तेयी च गुरुतल्पेरतः सदा।<br>मद्यपो वृषलीसक्तः परदारविधर्षकः ॥ २८<br><br>ब्रह्मस्वहा तथा गोघ्नो मातृहा पितृहा तथा।<br>देवप्रच्यावकश्चैव लिङ्गप्रध्वंसकस्तथा ॥ २९<br><br>तथ अन्यानि च पापानि मानसानि द्विजो यदि।<br>वाचिकानि तथान्यानि कायिकानि सहस्रशः ॥ ३०<br><br>कृत्वा विमुच्यते सद्यो जन्मान्तरशतैरपि।<br>एतद्रहस्यं कथितमघोरेशप्रसङ्गतः ॥ ३१<br><br>तस्माज्जपेद् द्विजो नित्यं सर्वपापविशुद्धये ॥ ३२ | आगे विधिपूर्वक ब्रह्मसम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २६ ॥<br><br>ऐसा करके कृतघ्न, ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्या करनेवाला, वीरघाती, गुरुकी हत्या करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, चौर-वृत्तिवाला, स्वर्णचोर, गुरुकी पत्नीमें सदा आसक्ति रखनेवाला, मद्यपान करनेवाला, शूद्र-स्त्रीमें आसक्त, परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवाला, ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला, गोहत्यारा, माता-पिताकी हत्या करनेवाला, देवताओंकी मूर्ति खण्डित करनेवाला, शिवलिङ्ग ध्वस्त करनेवाला तथा हजारों प्रकारके अन्य मानसिक-वाचिक-शारीरिक पाप करनेवाला द्विज शीघ्र ही पापमुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, इस विधिके करनेसे सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरके पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मैंने अघोरेश्वर भगवान् शिवके प्रसंगसे इस रहस्यका वर्णन किया है। अतएव द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यको सभी पापोंसे मुक्तिहेतु इस अघोर मन्त्रका जप नित्य करना चाहिये ॥ २७—३२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽघोरेशमाहात्म्यं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरेशमाहात्म्य' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अथान्यो ब्रह्मणः कल्पो वर्तते मुनिपुङ्गवाः।<br>विश्वरूप इति ख्यातो नामतः परमाद्भुतः ॥ १ | हे मुनिश्रेष्ठो! असित कल्पके अनन्तर 'विश्वरूप' नामसे विख्यात ब्रह्माजीका दूसरा अत्यन्त अद्भुत कल्प आरम्भ हुआ ॥ १ ॥ |
| विनिवृत्ते तु संहारे पुनः सृष्टे चराचरे।<br>ब्रह्मणः पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>प्रादुर्भूता महानादा विश्वरूपा सरस्वती।<br>विश्वमाल्याम्बरधरा विश्वयज्ञोपवीतिनी ॥ ३<br><br>विश्वोष्णीषा विश्वगन्धा विश्वमाता महोष्ठिका।<br>तथाविधं स भगवानीशानं परमेश्वरम् ॥ ४ | समस्त जगत्के संहारके अनन्तर चराचर संसारकी पुनः सृष्टिके निमित्त पुत्र-कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष महान् नाद करती हुई विश्वरूपा सरस्वती गौ प्रकट हुई। वह विश्वरूप माला, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा शिरोभूषण (पगड़ी) धारण की हुई थी। उन महोष्ठिका विश्वमाताके सभी अंग विश्वगन्धसे अनुलिप्त थे ॥ २-३ १/२ ॥ |
| शुद्धस्फटिकसङ्काशं सर्वाभरणभूषितम्।<br>अथ तं मनसा ध्यात्वा युक्तात्मा वै पितामहः ॥ ५ | तदनन्तर वे युक्तात्मा भगवान् ब्रह्मा उसी प्रकारके विश्वरूपवाले, शुद्ध स्फटिकमणिके तुल्य आभायुक्त |