श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २९ ] षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि ७१५
| विष्णुना कथितैर्वापि तण्डिना कथितैस्तु वा।<br>दक्षेण मुनिमुख्येन कीर्तितैरथ वा पुनः॥ ९३<br><br>महापूजा प्रकर्तव्या महादेवस्य भक्तितः।<br>शिवार्चकाय दातव्या दक्षिणा स्वगुरोः सदा॥ ९४<br><br>देहार्णवं च सर्वेषां दक्षिणा च यथाक्रमम्।<br>दीनान्धकृपणानां च बालवृद्धकृशातुरान्॥ ९५<br><br>भोजयेच्च विधानेन दक्षिणामपि दापयेत्॥ ९६ | कहे गये¹ अथवा [शिवभक्त] तण्डीके द्वारा कहे गये² अथवा मुनिश्रेष्ठ दक्षके द्वारा कहे गये³ शिवके हजार नामोंसे हजार कलशोंके जलसे शिवका अभिषेक करे॥ ८०-९३॥<br><br>भक्तिपूर्वक अपने गुरु महादेवकी सदा महापूजा करनी चाहिये और शिवपूजकको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तुलाद्रव्य और दक्षिणा यथाक्रम ऋत्विज् आदि तथा दीनों, अन्धों, दरिद्रोंको देनी चाहिये; साथ ही बालकों, वृद्धों, निर्बलों तथा रोगियोंको विधान-पूर्वक भोजन कराना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९४-९६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तुलापुरुषदानविधिर्नामाष्टाविंशत्तमोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तुलापुरुषदानविधि' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| तुला ते कथिता ह्येषा आद्या सामान्यरूपिणी।<br>हिरण्यगर्भं वक्ष्यामि द्वितीयं सर्वसिद्धिदम्॥ १ | सनत्कुमार बोले— मैंने आपसे प्रथमतः सामान्यरूपसे तुलादानका वर्णन कर दिया; अब समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हिरण्यगर्भदानके विषयमें बताऊँगा॥ १॥ |
| अधःपात्रं सहस्रेण हिरण्येन विधीयते।<br>ऊर्ध्वपात्रं तदर्धेन मुखं संवेशमात्रकम्॥ २ | इसके लिये हजार स्वर्ण-मुद्राओंसे एक नीचेका पात्र बनाना चाहिये और उसके आधे अर्थात् पाँच सौ स्वर्ण-मुद्राओंसे उसके प्रवेश-प्रमाण मुखवाला ऊर्ध्वपात्र (ढक्कन) निर्मित कराना चाहिये। उस शुभ स्वर्णपात्रको सभी अलंकारोंसे विभूषित करना चाहिये॥ २½॥ |
| हैममेवं शुभं कुर्यात्सर्वालङ्कारसंयुतम्।<br>अधःपात्रे स्मरेद्देवीं गुणत्रयसमन्विताम्॥ ३<br><br>चतुर्विंशतिकां देवीं ब्रह्मविष्णुग्निरूपिणीम्।<br>ऊर्ध्वपात्रे गुणातीतं षड्विंशकमुमापतिम्॥ ४ | तत्पश्चात् नीचेके मुख्य पात्रमें त्रिगुणात्मिका, चतुर्विंशति-तत्त्वस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा-विष्णु-अग्निस्वरूपा भगवतीका ध्यान करे और ऊपरके पात्रमें छब्बीसवें तत्त्वरूप गुणातीत उमापति सदाशिवका और पचीसवें तत्त्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषका ध्यान करे॥ ३-४½॥ |
| आत्मानं पुरुषं ध्यायेत्पञ्चविंशकमग्रजम्।<br>पूर्वोक्तस्थानमध्येऽथ वेदिकोपरि मण्डले॥ ५ | तदनन्तर पूर्वकी भाँति बताये गये स्थानमें वेदी तथा मण्डल बनाकर पात्रको लेकर शालि (धान)-के ऊपर |
१. भगवान् विष्णुद्वारा कथित यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ९८वें अध्यायमें है।
२. शिवभक्त तण्डीप्रोक्त यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ६५वें अध्यायमें वर्णित है।
३. मुनिश्रेष्ठ दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनाम 'शिवरहस्य' नामक ग्रन्थमें वर्णित है।