श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३१] सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि ७१७
| चतुरङ्गुलहीनं तु मध्यमं मुनिपुङ्गवाः।<br>दण्डतुल्यं कनिष्ठं स्याद्दण्डहीनं न कारयेत्॥ ६<br><br>वेष्टयित्वा नवैर्वस्त्रैः परितः पूजयेत्क्रमात्।<br>सद्यादीनि प्रविन्यस्य पूजयेद्विधिपूर्वकम्॥ ७<br><br>अष्टदिक्षु च कर्तव्याः पूर्वोक्ता मूर्तयः क्रमात्।<br>त्रिनिष्केन सुवर्णेन प्रत्येकं कारयेत्क्रमात्॥ ८ | हो, तो उसे उत्तम कहा गया है। हे श्रेष्ठ मुनियो! दण्डसे चार अंगुल कम रहनेपर मध्यम तथा दण्डके बराबर होनेपर कनिष्ठ श्रेणीका होता है। तिलके ढेरको दण्डसे नीचे नहीं करना चाहिये। इस तिलपर्वतको नवीन वस्त्रोंसे चारों ओरसे लपेटकर क्रमसे पूजन करना चाहिये। वहाँ 'सद्योजात' आदि पंचब्रह्मोंको क्रमसे स्थापित करके विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें कही गयी मूर्तियोंको आठों दिशाओंमें क्रमसे स्थापित करना चाहिये; प्रत्येक मूर्तिको तीन निष्क सुवर्णसे निर्मित कराना चाहिये॥ ४–८॥ | | दक्षिणा विधिना कार्या तुलाभारवदेव तु।<br>होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो यथावन्मुनिसत्तमाः॥ ९<br><br>अर्चयेद्देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्।<br>तिलपर्वतमध्यस्थं तिलपर्वतरूपिणम्॥ १०<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या सहस्रकलशादिभिः।<br>दर्शयेत्तिलमध्यस्थं देवदेवमुमापतिम्॥ ११<br><br>पूजयित्वा विधानेन क्रमेण च विसर्जयेत्।<br>श्रोत्रियाय दरिद्राय दापयेत्तिलपर्वतम्॥ १२<br><br>एवं तिलनगः प्रोक्तः सर्वस्मादधिकः परः॥ १३ | तुलाभारके कृत्यकी भाँति इसमें दक्षिणा देनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! इस दानमें पूर्वकी भाँति यथावत् होम करना भी बताया गया है। लोकपालोंसे आवृत, तिल पर्वतके मध्यमें विराजमान तथा तिलपर्वतरूपी देवदेवेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये। हजार कलशोंसे शिवकी अर्चना करनी चाहिये। अपने इष्टजनोंको तिलके मध्यमें स्थित देवाधिदेव उमापतिका दर्शन कराना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक उनका पूजन करके विसर्जन करना चाहिये। तत्पश्चात् उस तिलपर्वतको धनहीन श्रोत्रिय [ब्राह्मण]–को दिला देना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे तिलपर्वतके दानका वर्णन कर दिया; यह सभी दानोंसे श्रेष्ठ है॥ ९–१३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलपर्वतदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलपर्वतदान' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यं पर्वतं सूक्ष्ममल्पद्रव्यं महाफलम्।<br>द्रव्यमात्रोपसंयुक्ते काले मध्यं विधीयते॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब एक अन्य सूक्ष्म तिलपर्वतके दानके विषयमें बताता हूँ, जो व्ययमें अल्प द्रव्यवाला, किंतु महान् फल प्रदान करनेवाला है। जब भी व्यक्ति द्रव्यसे सम्पन्न हो जाय, तब इस पवित्र कृत्यको करे॥ १॥ | | गोमयालिप्तभूमौ तु ह्याम्बराणि प्रकीर्य च।<br>तन्मध्ये निक्षिपेद्धीमांस्तिलभारत्रयं शुभम्॥ २ | बुद्धिमान् पुरुषको गोमयसे विधिवत् लीपी गयी भूमिपर वस्त्र बिछाकर उसके मध्यमें तीन भार विशुद्ध तिल स्थापित करना चाहिये॥ २॥ |