भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 723

अध्याय ३६ ] ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि ७२१


दन्तस्थाने प्रकर्तव्यः पुष्परागः सुशोभनः।<br>पशुवत्कारयित्वा तु वत्सं कुर्यात्सुशोभनम्॥ ६<br><br>सुवर्णदशनिष्केण सर्वरत्नसुशोभितम्।<br>पूर्वोक्तवेदिकामध्ये मण्डलं परिकल्प्य तु॥ ७<br><br>तन्मध्ये सुरभिं स्थाप्य सवत्सां सर्वतत्त्ववित्।<br>सवत्सां सुरभिं तत्र वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत्॥ ८<br><br>सम्पूजयेद्गां गायत्र्या सवत्सां सुरभिं पुनः।<br>अथैकाग्निविधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि॥ ९<br><br>समिदाज्यविधानेन पूर्ववच्छेषमाचरेत्।<br>शिवपूजा प्रकर्तव्या लिङ्गं स्नाप्य घृतादिभिः॥ १०<br><br>गामालभ्य च गायत्र्या शिवायादापयेच्छुभाम्।<br>दक्षिणा च प्रकर्तव्या त्रिंशन्निष्का महामते॥ ११मध्यमें दिव्य मोती लगाना चाहिये। वैदूर्य मणिसे स्तनोंको तथा नीलरत्नसे शुभ पुच्छको भूषित करना चाहिये। दाँतोंमें परम सुन्दर पुष्पराज लगाना चाहिये। साथ ही दस निष्क सुवर्णसे गायकी भाँति एक सुन्दर बछड़ा बनवाकर उसे सभी रत्नोंसे विभूषित करना चाहिये॥ ४-६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् सर्वतत्त्वविद् पुरुषको चाहिये कि पूर्वमें बतायी गयी विधिसे निर्मित वेदिकाके मध्य मण्डल बनाकर उसके मध्यमें बछड़ेसहित धेनुको रखकर बछड़ेसहित उस गौको दो वस्त्रोंसे वेष्टित कर दे और गायत्रीमन्त्रसे बछड़ेसहित उस सुरभि गौकी पूजा करे॥ ७-८ १/२॥<br><br>इसके बाद अग्निविधानसे समिधा तथा घृतसे विधिपूर्वक होम करना चाहिये; शेष कार्य पूर्वकी भाँति करना चाहिये। तत्पश्चात् शिवलिङ्गको घृत आदिसे स्नान कराकर शिव-पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गौका स्पर्श करके गायत्रीमन्त्रका उच्चारणकर उस मंगलमयी धेनुको शिवको अर्पण कर देना चाहिये। हे महामते! तीस निष्क सुवर्णकी दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९-११॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हेमधेनुदानविधिनिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हेमधेनुदानविधिनिरूपण' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥


छत्तीसवाँ अध्याय

ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि

सनत्कुमार उवाचसनत्कुमार बोले—
लक्ष्मीदानं प्रवक्ष्यामि महदैश्वर्यवर्धनम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कार्यं वेदिकोपरिमण्डले॥ १<br><br>श्रीदेवीमतुलां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि।<br>सहस्रेण तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः॥ २<br><br>अष्टोत्तरशतेनापि सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>मण्डले विन्यसेल्लक्ष्मीं सर्वालङ्कारसंयुताम्॥ ३अब मैं महान् ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मीदानका वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति बताये गये विधानसे निर्मित मण्डपमें बनायी गयी वेदीके ऊपर यह दानकर्म करना चाहिये। हजार स्वर्णमुद्राओं अथवा उसके आधे अथवा उसके आधे अथवा एक सौ आठ स्वर्णमुद्राओंसे विधिपूर्वक अनुपम तथा सभी लक्षणोंसे युक्त श्रीदेवीप्रतिमा बनाकर उन लक्ष्मीजीको सभी अलंकारोंसे विभूषित करके मण्डलमें स्थापित करना चाहिये॥ १-३॥