श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ७६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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मिलती है। अतः यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। वहाँ वाराणसी-माहात्म्य-सम्बन्धी सामग्री कहीं स्फुट रूपमें तथा कहीं अध्यायोंमें उपनिबद्ध है, किंतु अध्यायोंमें श्लोकसंख्याका अंकन नहीं है। भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीके प्रधान संवादके रूपमें उपलब्ध वह सामग्री तीसरे अध्यायसे अठारहवें अध्यायतक वहाँ दी गयी है, किंतु सुविधाकी दृष्टिसे तीसरे अध्यायको प्रथम अध्याय मानकर सम्पूर्ण सामग्री जिस रूपमें तथा जिस क्रममें कृत्यकल्पतरुमें उपलब्ध है, उसी रूपमें तथा उसी क्रममें श्लोक-संख्या अंकितकर मूल श्लोकोंसहित उसका हिन्दीभावानुवाद यहाँ दिया जा रहा है। इसे पढ़कर भगवद्भक्तों तथा श्रद्धालुजनोंमें भगवान् साम्बसदाशिवके प्रति विशेष श्रद्धा जाग्रत् होगी तथा आशा है कि सभी पाठक महानुभाव इससे लाभ उठायेंगे— सम्पादक ]
पहला अध्याय
अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन
| ईश्वर उवाच | श्लोकार्थ |
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| अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि उपायज्ञानसाधनम्।<br>यानि तीर्थानि चोक्तानि व्योमतन्त्रे पुरा मया॥ १<br>तेषामप्यधिकं तीर्थमविमुक्तं महामुने।<br>सर्वतीर्थानि च मया तस्मिन् स्थाने प्रतिष्ठिताः॥ २ | ईश्वर बोले—हे महामुने! अब मैं आपको ज्ञानप्राप्तिका अन्य साधन बताऊँगा। मैंने पूर्वमें व्योमतन्त्रमें जिन तीर्थोंका वर्णन किया था, उन सबसे बढ़कर अविमुक्त तीर्थ है। मैंने समस्त तीर्थोंको उस [अविमुक्त] स्थानमें स्थापित कर दिया है॥ १-२॥ |
| न कदाचिन्मया मुक्तं स्थानं च सततं मुने।<br>सर्वतीर्थमयं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत्॥ ३ | हे मुने! मैं यहाँ सतत स्थित रहता हूँ, मैंने कभी भी इस स्थानका त्याग नहीं किया; यह सभी तीर्थोंसे युक्त, पुण्यप्रद, गुह्यसे भी गुह्यतर तथा महान् है॥ ३॥ |
| स्थानानां चैव सर्वेषामादिभूतं महेश्वरम्।<br>यत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिसत्तम॥ ४<br>अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्।<br>तत्र चैव तु सम्भूतो ज्ञानं प्राप्नोति मानवः॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ! महेश्वरका यह स्थान सभी स्थानोंके आदिमें प्रादुर्भूत हुआ, जहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त किया। वहाँपर उत्पन्न हुआ मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४-५॥ |
| गच्छ वाराणसीं शीघ्रं यत्र देवः सनातनः।<br>देवताभिः समस्ताभिस्तत्र देवः पिनाकधृक्॥ ६<br>स्तूयते वरदो देवैर्ब्रह्मादिभिरभीक्ष्णशः।<br>तत्रासिवरणा चैव निम्नगे सिद्धसेविते॥ ७ | आप शीघ्र वाराणसी जाइये, जहाँ सनातन देव [शिवजी] समस्त देवताओंके साथ विद्यमान हैं। ब्रह्मा आदि देवता वर प्रदान करनेवाले पिनाकधारी शिवकी वहाँ निरन्तर स्तुति करते हैं। वहाँ सिद्धोंके द्वारा सेवित ‘असि’ तथा ‘वरणा’ [नामक] दो नदियाँ हैं॥ ६-७॥ |
| बहुजन्माप्तपापानां दुष्टानां देहिनां भुवि।<br>क्षालनं कुरुते देवि सा नदी यत्र जाह्नवी॥ ८<br>या दृशा सर्वथा स्वर्गे सा नदीनां सरिद्वरा।<br>या माता सर्वभूतानां सा गङ्गा यत्र निम्नगा॥ ९ | हे देवि! वहाँ गङ्गा नदी पृथ्वीतलपर दुष्ट प्राणियोंके अनेक जन्मोंके अर्जित पापोंका क्षालन करती हैं। जो सदा स्वर्गमें दृष्टिगत होती हैं तथा जो सभी प्राणियोंकी माता हैं, वे नदियोंमें श्रेष्ठ गंगा नदी वहाँ विद्यमान हैं॥ ८-९॥ |
| अविमुक्तं परं क्षेत्रं शङ्करस्य सदैव हि।<br>तत्र स्थानं प्रसिद्धं च त्रैलोक्ये शूलपाणिनः॥ १०<br>निम्नगाभ्यां पुरी सा च नाम्ना वाराणसी मुने।<br>कृतस्नानेन देवेन ओङ्कारे संस्थितेन वा।<br>तस्मिन् काले वरो दत्तो देवदेवेन शम्भुना॥ ११ | वहाँ शंकरजीका सदैव परम अविमुक्तक्षेत्र है, वह शूलपाणि शिवजीका तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध निवास-स्थान है। हे मुने! दोनों [वरणा तथा असि] नदियोंसे युक्त होनेके कारण वह पुरी ‘वाराणसी’ नामसे विख्यात है। स्नान करनेके अनन्तर ओंकारमें संस्थित देवदेव |