श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ८०२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वेश्म प्रविश्य देवेशि स्थिता तत्रैव भामिनि।<br>दण्डेन देवदेवस्य स्थितेन सुमहत्सरः ॥ १९<br>दण्डखातमिति प्राहुर्ये पुराणविदो जनाः।<br>तस्मात्स्नानं तु कर्तव्यं तत्रैव श्रेय इच्छया॥ २० | लोग हैं, वे उसे 'दण्डखात'—इस नामसे पुकारने लगे हैं। अतः मनुष्यको [अपने] कल्याणकी कामनासे वहाँपर स्नान करना चाहिये॥ १५-२०॥ |
| तत्र स्नाने कृते देवि कृतकृत्यो भवेन्नरः।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा स्वकान् पितॄन् ॥ २१<br>नरकस्थास्तु ये देवि पितृलोके वसन्ति ते।<br>पिशाचत्वं गता ये च नराः पापेन कर्मणा॥ २२ | हे देवि! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। [हे देवि!] दण्डखातमें स्नान करके मनुष्यको अपने पितरोंका तर्पण करना चाहिये। हे देवि! जो [पितर] नरकमें स्थित हैं, वे [तर्पणके प्रभावसे] पितृलोकमें वास करते हैं। अपने पापकर्मसे जो [पितृगण] पिशाचत्वको प्राप्त हुए हैं, वहाँ पिण्डदान करनेसे उनके देहका उद्धार कहा गया है॥ २१-२२१/२॥ |
| तेषां पिण्डप्रदानेन देहस्योद्धरणं स्मृतम्।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा किं भूयः परिशोचति ॥ २३<br>यस्य स्मरणमात्रेण पापसङ्घातपञ्जरम्।<br>नश्यते शतधा देवि दण्डखातस्य दर्शनात्॥ २४ | दण्डखातमें स्नान करके मनुष्य भला कैसे सन्तप्त रह सकता है? हे देवि! जिस दण्डखातके स्मरणमात्रसे तथा दर्शनसे पापसमूहका पंजर सैकड़ों भागोंमें होकर विनष्ट हो जाता है, उस दण्डखातके माहात्म्य तथा पुण्यप्रद महायशका श्रवण कीजिये॥ २३-२४१/२॥ |
| तस्य दण्डस्य माहात्म्यं पुण्यं शृणु महायशः।<br>सूर्योपरागे देवेशि नरा आयान्ति सुव्रते॥ २५<br>कुरुक्षेत्रं महत्पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>निवृत्ते ग्रहणे देवि कुरुक्षेत्रात्परं पदम्॥ २६<br>दण्डखातं समायान्ति आत्मशुद्ध्यर्थकारणम्।<br>दर्शनात्तस्य खातस्य कृतकृत्योऽभिजायते ॥ २७ | हे देवेशि! हे सुव्रते! सूर्यग्रहणके अवसरपर मनुष्य महापुण्यप्रद तथा सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत कुरुक्षेत्रमें आते हैं और हे देवि! ग्रहणके समाप्त होनेपर वे कुरुक्षेत्रसे परम पदस्वरूप तथा आत्मशुद्धिके कारणभूत दण्डखातमें आते हैं, उस दण्डखातके दर्शनसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥ २५-२७॥ |
| अन्यदायतनं तत्र मम देवि महेश्वरि।<br>जैगीषव्येश्वरं नाम स्थापितं सुमहात्मना॥ २८<br>जैगीषव्यगुहा तस्मिन् देवदेवस्य सन्निधौ।<br>त्रिकालमर्चयाँल्लिङ्गं भक्त्या तद्भावितात्मना ॥ २९ | हे देवि! हे महेश्वरि! वहाँ परम महात्मा [जैगीषव्य]-के द्वारा स्थापित किया गया जैगीषव्येश्वर नामक अन्य आयतन भी है। उसमें जैगीषव्यकी गुहा स्थित है, वहाँ देवदेवकी सन्निधिमें उन्होंने भक्तिपूर्वक शिवमें आसक्त चित्तसे लिङ्गका त्रिकाल अर्चन किया था॥ २८-२९॥ |
| एवमाराधितो देवि जैगीषव्येण धीमता।<br>तस्य पृष्टश्चाहं देवि सर्वान् कामान् प्रदत्तवान्।<br>तस्मात्तु सुकृतं लिङ्गं पूजयिष्यन्ति ये नराः॥ ३०<br>ज्ञानं तेषां ध्रुवं देवि अचिराज्जायते भुवि।<br>त्रिरात्रं तत्र कृत्वा वै यो नरः पूजयिष्यति ॥ ३१<br>गुह्यं प्रविश्यते चैव ज्ञानयुक्तो भवेन्नरः।<br>तस्य वै पश्चिमे भागे सिद्धकूपस्तु दक्षिणे॥ ३२ | हे देवि! इस प्रकार बुद्धिमान् जैगीषव्यके द्वारा मेरी आराधना की गयी, तब हे देवि! उनके माँगनेपर मैंने उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण किया। इसलिये हे देवि! पृथ्वीलोकमें जो मनुष्य इस पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करते हैं, उन्हें निश्चित रूपसे शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य वहाँ तीन रात्रि [उपवासपूर्वक] व्यतीत करके लिङ्गका पूजन करता है, वह गूढतत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है और ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३०-३११/२॥ |