भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 807, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 807

अध्याय १०] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०५

ऐशानीं मूर्तिमास्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात्॥ ३ईशानका स्वरूप धारण करके मैं उस स्थानमें स्थित हूँ, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानका लोक प्राप्त करता है॥ ३॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु दधिकर्णह्रदं स्थितम्।<br>उत्तरे कूपमेवं तु तस्य नामस्य सुन्दरि॥ ४<br>दधिकर्णेश्वरं देवं मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं तु देवेशि गभस्तीशस्य चोत्तरे॥ ५उसके दक्षिणभागमें दधिकर्णह्रद स्थित है। हे सुन्दरि! उत्तरमें उसीके नामका कूप विद्यमान है। हे देवेशि! गभस्तीश्वरके उत्तरमें पूर्वकी ओर मुखवाला दधिकर्णेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है॥ ४-५॥
दक्षिणेन गभस्तीशाद्वाराणस्यां तु सुव्रते।<br>मानवानां हितार्थाय त्वं च तत्र व्यवस्थिता॥ ६<br>आराधयन्ति देवि त्वामुत्तराभिमुखीं स्थिताम्।<br>ये च त्वा पूजयिष्यन्ति तस्मिन् स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ७<br>तेषां त्वं विविधाँल्लोकान् सम्प्रदास्यसि मोदते।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति तवाग्रे दीपधारिणः॥ ८हे सुव्रते! वाराणसीमें गभस्तीशके दक्षिणमें मानवोंके कल्याणके लिये [स्वयं] आप विराजमान हैं और उस स्थानमें मैं भी स्थित हूँ। हे देवि! जो लोग वहाँ उत्तरकी ओर मुख करके विराजमान आपकी आराधना करते हैं तथा आपकी पूजा करते हैं, उन्हें प्रसन्न होकर आप विविध लोक प्रदान करती हैं॥ ६-७^{१}/_{२}॥
तेषां त्वमक्षयाँल्लोकान् वितरिष्यसि भामिनि।<br>आलयं ये प्रकुर्वन्ति तवार्थे वरवर्णिनि॥ ९<br>तेषां त्वमक्षयाँल्लोकान् प्रयच्छसि न संशयम्।हे भामिनि! आपके सामने दीप धारण किये हुए जो लोग जागरण करते हैं, उन्हें आप अक्षय लोक प्रदान करती हैं। हे वरवर्णिनि! जो लोग आपके लिये आलयका निर्माण करते हैं, उन्हें आप अक्षय लोक प्रदान करती हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ८-९^{१}/_{२}॥
आलयं ये प्रकुर्वन्ति भूमिं सम्मार्जयन्ति च॥ १०<br>तेषामष्टसहस्त्रस्य सुवर्णस्य फलं लभेत्।<br>त्वामुद्दिश्य तु यो देवि ब्राह्मणान् ब्राह्मणीश्च ह॥ ११<br>भोजयिष्यति यो देवि तस्य पुण्यफलं शृणु।<br>तव लोके वसेत्कल्पमिहैवागच्छते पुनः॥ १२<br>नरो वा यदि वा नारी सर्वभोगसमन्वितौ।<br>धनधान्यसमायुक्तौ जायेते च महाकुले॥ १३<br>सुभगौ दर्शनीयौ च रूपयौवनदर्पितौ।<br>भवेतामीदृशौ देवि सर्वसौख्यस्य भाजने॥ १४जो लोग आलयका निर्माण करते हैं तथा वहाँकी भूमिका सम्मार्जन करते हैं, उन्हें आठ हजार स्वर्णमुद्राकी प्राप्ति होती है। हे देवि! आपको उद्देश्य करके जो ब्राह्मणों तथा ब्राह्मणियोंको भोजन कराता है, उसके पुण्यफलको सुनिये—वह कल्पपर्यन्त आपके लोकमें वास करता है, इसके बाद इस लोकमें आता है! पुरुष हो अथवा स्त्री—वे सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त तथा धनधान्यसे समन्वित रहते हैं और श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न होते हैं। हे देवि! वे सौभाग्यशाली, दर्शनीय, रूपयौवनसे सम्पन्न तथा सभी प्रकारके सुखोंके भाजन होते हैं॥ १०-१४॥
मानुषं दुर्लभं प्राप्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम्।<br>येन दृष्टासि सुश्रोणि तस्य जन्मभयं कुतः॥ १५<br>मायापुर्यां तु ललितां दृष्ट्वा यल्लभते फलम्।<br>तत्फलं तस्य देवेशि यस्त्वां तत्र निरीक्षयेत्॥ १६हे सुश्रोणि! विद्युत्-सम्पाततुल्य चंचल दुर्लभ मनुष्यशरीर प्राप्त करके जिसने आपका दर्शन कर लिया, उसे जन्मका भय कहाँसे हो सकता है? मायापुरीमें ललिता [देवी]-का दर्शन करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, हे देवेशि! यदि वह यहाँपर आपका दर्शन करे, तो उसे वही फल प्राप्त हो जाता है॥ १५-१६॥
पृथ्वीं प्रदक्षिणं कृत्वा यत्फलं लभते नरः।<br>तत्फलं ललितायां च वाराणस्यां न संशयः॥ १७पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह वाराणसीमें ललिताकी प्रदक्षिणासे प्राप्त कर