भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 834 में से

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पृष्ठ 825

अध्याय १४ ] हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन [ ८२३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
केदाराद्दाक्षिणे चैव लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>नीलकण्ठेति नामानं सुरलोकप्रदायकम्॥ ७करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ ५-६॥<br>केदारके ही दक्षिणमें देवलोक प्रदान करनेवाला नीलकण्ठ नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ७॥
तस्यैव वायवे कोणे अम्बरीषेश्वरं शुभम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं वै दक्षिणामुखम्॥ ८<br>नाम्ना कालञ्जरं देवं सर्वपातकनाशनम्।<br>तस्यैव दक्षिणे भागे लोलार्को नाम वै रविः॥ ९उसीके वायव्य कोणमें अम्बरीषेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिण दिशाभागमें कालेंजर नामक दक्षिणाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८½॥<br>उसीके दक्षिण भागमें लोलार्क नामक सूर्यदेव विद्यमान हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सूर्यलोक प्राप्त करता है।
तस्य दर्शनमात्रेण सूर्यलोकमवाप्नुयात्।<br>लोलार्कात् पश्चिमे भागे दुर्गादेवी च तिष्ठति॥ १०<br>मानवानां हितार्थाय कूटे क्षेत्रस्य दक्षिणे।<br>दुर्गायाः पश्चिमे देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ११<br>असितेन च तद्देवि भक्त्या वै संप्रतिष्ठितम्।लोलार्कके पश्चिमभागमें तथा क्षेत्रके दक्षिणमें कूटपर मनुष्योंके हितके लिये दुर्गादेवी स्थित हैं। हे देवि! दुर्गाके पश्चिममें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह लिङ्ग महात्मा असितके द्वारा भक्तिपूर्वक स्थापित किया गया है॥ ९-११½॥
शुष्कनद्यास्तु नाम्ना वै शुष्केश्वरमिति स्मृतम्॥ १२<br>शुष्केश्वरात् पश्चिमेन नाम्ना तु जनकेश्वरम्।<br>जनकेन महाभागे भक्त्या चापि प्रतिष्ठितम्॥ १३<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दर्शनाद्व्यथः शुभे।शुष्क नदीके नामसे शुष्केश्वर लिङ्ग भी बताया गया है। शुष्केश्वरके पश्चिममें जनकेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है। हे महाभागे! जनकके द्वारा भक्तिपूर्वक उसे स्थापित किया गया है। हे शुभे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, उसके दर्शनसे मनुष्य व्यथारहित हो जाता है॥ १२-१३½॥
तस्यैव चोत्तरे भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ १४<br>शङ्कुकर्णेश्वरं नाम लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतसिद्धिर्भवेन्नृणाम्॥ १५हे यशस्विनि! उसीके उत्तरभागमें समीपमें वहींपर शंकुकर्णेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्योंके व्रतकी सिद्धि हो जाती है॥ १४-१५॥
शुष्केश्वराच्चोत्तरेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>सिद्धेश्वरेति नामानं कुण्डस्यैव तटस्थितम्॥ १६<br>तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं तु वै।<br>सर्वासामेव सिद्धीनां पारं गच्छति मानवः॥ १७शुष्केश्वरके उत्तरमें सिद्धेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह कुण्डके तटपर ही स्थित है। वहाँपर कुण्डमें स्नान करके तथा सिद्धेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त सिद्धियोंके पार चला जाता है॥ १६-१७॥
वायव्ये तु दिशाभागे शङ्कुकर्णेश्वरस्य तु।<br>माण्डव्येशमिति ख्यातं सुरसिद्धैस्तु वन्दितम्॥ १८शंकुकर्णेश्वरके वायव्य दिशाभागमें देवताओं तथा सिद्धोंसे वन्दित माण्डव्येश नामक लिङ्ग विद्यमान है॥ १८॥
तस्य चैव समीपे तु स्वयं देवश्च तिष्ठति।<br>गणैः परिवृतो देवि देव्या सह महाप्रभुः॥ १९<br>द्वारे स्वे तिष्ठते देवि स्वयं क्षेत्रं च रक्षति।<br>देवस्य चोत्तरे भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ २०उसके समीपमें स्वयं देव [शिवजी] स्थित हैं। हे देवि! वे महाप्रभु [वहाँ] गणों तथा देवी [पार्वती]-से घिरे रहकर अपने द्वारपर विराजमान रहते हैं और स्वयं क्षेत्रकी रक्षा करते हैं॥ १९½॥
मुखलिङ्गं तु तत्रैव लिङ्गं पूर्वामुखं शुभे।<br>तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २१देवके उत्तरभागमें समीपमें ही वहाँपर एक मुख-लिङ्ग है, हे शुभे! वह लिङ्ग पूर्वाभिमुख है। उसीके उत्तरभागमें छागलेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग
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