भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| तस्मादन्येऽपि ये केचिल्लिङ्गस्याराधने रताः ।<br>तेषां वै पश्चिमे काले ज्ञानमुत्पद्यते सदा ॥ १७ | आराधना करने लगे, उस स्थानमें सबके द्वारा आराधित होनेवाले देवेश सदा स्थित रहते हैं॥ १५-१६॥<br><br>अतः जो कोई दूसरे लोग भी लिङ्गकी आराधनामें संलग्न रहते हैं, उन्हें अन्तिम समयमें ज्ञानका उदय हो जाता है॥ १७॥ | | एवं ज्ञात्वा तु यो मर्त्यः सदा लिङ्गार्चने रतः ।<br>न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ १८ | इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्गके अर्चनमें सदा रत रहता है, सौ करोड़ कल्पोंमें भी उसका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ १८॥ | | तस्माद्वै सम्प्रदायाच्च अर्चितव्यं प्रयत्नतः ।<br>मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ १९ | अतः विद्युत्-सम्पातके समान चंचल (अस्थिर) दुर्लभ मानवशरीर प्राप्त करके शैवविधानके अनुसार प्रयत्नपूर्वक लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। जो विप्र लिङ्गका अर्चन करता है, वह अपना उद्धार कर लेता है और जो लिङ्गका अर्चन नहीं करता है, वह अपनेको विनष्ट कर लेता है॥ १९-२०॥ | | लिङ्गं योऽर्चयते विप्र आत्मानं स समुद्धरेत् ।<br>आत्मानं घातयेन्नित्यं यो न लिङ्गं समर्चयेत् ॥ २० | |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्वायतनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्वायतनवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

॥ श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट पूर्ण हुआ ॥