श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ९१ |
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शिष्य नहीं बनाते, इसीलिए आपस में इस तरह की फूट हुआ करती है।
“सभी मनुष्य दिखने में एक सरीखे हैं, पर हर एक का स्वभाव भिन्न है। किसी के भीतर सत्त्वगुण अधिक है, किसी के भीतर रजोगुण तो किसी के भीतर तमोगुण। गुझियाँ बाहर से एक-सी दिखायी देती हैं पर किसी के भीतर खोया, किसी के भीतर नारियल तो किसी के भीतर उड़द की दाल होती है। (सब हँसते हैं।)
“मेरा भाव क्या है, जानते हो ? मैं खाता, पीता और मजे में रहता हूँ, बाकी की सब माँ ही जाने। तीन बातों से मेरी देह में मानो काँटा चूभ जाता है – गुरु, कर्ता और बाबा।
“गुरु एकमात्र सच्चिदानन्द ही हैं। वे ही सब को शिक्षा देंगे। मेरा सन्तानभाव है। वैसे मनुष्य-गुरु तो लाखों मिलते हैं। सभी गुरु बनना चाहते हैं। शिष्य कौन बनना चाहता है?
“लोकशिक्षा देना बड़ा कठिन है। यदि ईश्वर का साक्षात्कार हो और वे आदेश दें, तो यह सम्भव हो सकता है। नारद, शुकदेव आदि को आदेश हुआ था, शंकराचार्य को आदेश हुआ था। आदेश न मिलने से तुम्हारी बात कौन सुनेगा ? कलकत्ते के लोगों की हुल्लड़बाजी तो जानते ही हो! जब तक नीचे लकड़ी जलती है तब दूध उफनकर ऊपर आता है। लकड़ी को खींच लेते ही सब कुछ शान्त हो जाता है। कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। अभी एक जगह कुआँ खोद रहे हैं – पानी चाहिए। वहाँ पत्थर निकलने लगे कि खोदना छोड़ दिया! और एक जगह खोदना शुरू किया। वहाँ रेती निकलने लगी कि वह जगह भी छोड़ दी। फिर दूसरी जगह खोदने ही लगे। यही तो उनका हाल है।
“परन्तु आदेश मिला है यह केवल मन में सोच लेने से नहीं चलता। ईश्वर सचमुच ही दर्शन देते हैं और बातचीत करते हैं। इसी अवस्था में आदेश प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार आदेशप्राप्त व्यक्ति की बातों में कितना जोर होता है! पर्वत भी टल जाता है। सिर्फ लेक्चर से क्या होगा ? लोक कुछ दिन सुनेंगे, फिर भूल जाएँगे; उसके अनुसार नहीं चलेंगे।
पूर्वकथा – भावनेत्रोंसे हालदारपुकुर का दर्शन
“उस ओर हालदारपुकुर नाम का एक तालाब है। कुछ लोग उसके किनारे रोज सबेरे पाखाना फिरा करते थे। जो लोग सबेरे स्नानादि के लिए आते वे यह देखकर उनके नाम से खूब चिल्लाते, खूब कोसते। पर दूसरे दिन फिर वही हाल! पाखाना फिरना बन्द नहीं होता था। तब लोगों ने कम्पनी को यह बात जतायी। कम्पनीवालों ने एक चपरासी को भेजा। जब उस चपरासी ने आकर एक कागज चिपका दिया – ‘यहाँ पाखाना न फिरें’ – तब सब बन्द हो गया। (सब हँसते हैं)