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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | ९७

समाजगृह में पहले ही से जगह लेकर आसन पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण के आने की बाट जोह रहे हैं। चारों ओर आनन्द उमड़ रहा है। शरद् के नील आकाश में भी आनन्द की छाया झलक रही है। बाग के फूलों से लदे हुए पेड़ों और लताओं से छानकर आती हुई हवा भक्तों के हृदय में आनन्द का एक झोंका लगा जाती है। सारी प्रकृति मानो मधुर स्वर से गा रही है – 'आज हर्ष-शीतल-समीर भरते भक्तों के उर में हैं विभु।' सभी उत्कण्ठित हो रहे हैं, ऐसे समय श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आकर समाजगृह के सामने खड़ी हो गयी।

सभी ने उठकर महापुरुष का स्वागत किया। वे आये हैं – सुनते ही लोगों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया।

समाजगृह के प्रधान कमरे में वेदी बनायी गयी है। वह जगह आदमियों से भर गयी है। सामने दालान है; वहाँ श्रीरामकृष्ण बैठे हैं; वहाँ भी लोग जम गए हैं। दालान के दोनों ओर दो कमरे हैं – वहाँ भी लोग हैं, – सभी दरवाजे पर खड़े हुए बड़े उत्सुक होकर श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। दालान पर चढ़ने की सीढ़ियाँ बराबर दालान के एक छोर से दूसरे छोर तक हैं। इन सीढ़ियों पर भी अनेक लोग खड़े हैं। वहाँ से कुछ दूर पेड़ों और लतामण्डपों के नीचे रखी हुई बेंचों पर से भी लोग टक लगाकर महापुरुष के दर्शन कर रहे हैं। दोनों ओर फल और फूलों के पेड़ों की कतार लगी हुई है, – बीच में रास्ता है। सभी पेड़ हवा की झोंकों से धीरे धीरे डोल रहे हैं, मानो वे आनन्दमग्न हो मस्तक नवाकर उनका स्वागत कर रहे हों।

श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि एक साथ उनकी आनन्दमूर्ति पर जा गिरी। जब तक रंगमंच पर खेल शुरू नहीं होता तब तक दर्शकवृन्दों में से कोई तो हँसता है, कोई विषयचर्चा छेड़ता है, कोई अकेला या दोस्तों के साथ टहलता है, कोई पान खाता है, कोई सिगरेट पीता है। परन्तु परदा उठते ही सब लोग बातचीत बन्द कर, अनन्यचित्त होकर एकाग्र दृष्टि से खेल देखने लगते हैं। अथवा, एक फूल से दूसरे फूल में मँडरानेवाले भौंरे कमल की खोज पाते ही दूसरे फूलों को छोड़कर पद्ममधु का पान करने के लिए भागे चले आते हैं।

(२)

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते। (गीता, १४।२६)

हँसमुख श्रीरामकृष्ण शिवनाथ आदि भक्तों की ओर स्नेह की दृष्टि फेरते हुए कहते हैं, “क्या शिवनाथ! तुम भी आये हो? देखो तुम लोग भक्त हो, तुम लोगों को देखकर बड़ा आनन्द होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है; कभी तो उसे गले ही लगा लेता है। (शिवनाथ तथा अन्य सब हँसते हैं।)