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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१२२श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।। (गीता २।७०)

कामिनी-कांचन के लिए दासत्व

श्रीरामकृष्ण – पहले तुम इतना आते थे पर अब क्यों नहीं आते?

विजय – यहाँ आने की बड़ी इच्छा रहती है, परन्तु अब मैं स्वाधीन नहीं हूँ, ब्राह्मसमाज में नौकरी करता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – कामिनी-कांचन जीव को बाँध लेते हैं। जीव की स्वाधीनता चली जाती है। कामिनी ही से कांचन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए दूसरों की गुलामी की जाती है; फिर स्वाधीनता नहीं रहती, फिर तुम अपने मन का काम नहीं कर सकते।

“जयपुर में गोविन्दजी के पुजारी पहले-पहल अपना विवाह नहीं करते थे। तब वे बड़े तेजस्वी थे। एक बार राजा के बुलाने पर भी वे नहीं गए और कहा – ‘राजा ही को आने को कहो।’ फिर राजा और पंचों ने मिलकर उनका विवाह करा दिया। तब राजा से साक्षात् करने के लिए किसी को बुलाना नहीं पड़ा! वे खुद हाजिर होते थे। कहते ‘महाराज, आशीर्वाद देने आए हैं, यह निर्माल्य लाए हैं, धारण कीजिये।’ आज घर बनवाना है, आज लड़के का ‘अन्नप्राशन’ है, आज लड़के का पाठशाला जाने का शुभ मुहूर्त है इन्हीं कारणों से आना पड़ता है।

“‘बारह सौ ‘भगत’ और तेरह सौ ‘भगतिन’वाली कहावत तो जानते हो न! नित्यानन्द गोस्वामी के पुत्र वीरभद्र के तेरह सौ ‘भगत’ शिष्य थे। जब वे सिद्ध हो गए तब वीरभद्र डरे। वे सोचने लगे कि ये सब के सब सिद्ध हो गए, लोगों को जो कह देंगे वही होगा; जिधर से निकलेंगे वहीं भय है, क्योंकि मनुष्य बिना जाने यदि कोई अपराध कर डालेंगे तो उनका अहित होगा। यह सोचकर वीरभद्र ने उन्हें बुलाकर कहा, ‘तुम गंगातट से सन्ध्या-उपासना करके हमारे पास आओ।’ ‘भगत’ तब ऐसे तेजस्वी थे कि ध्यान करते ही करते समाधिमग्न हो गए। कब ज्वार का पानी सिर से बह गया, इसकी उन्हें खबर ही नहीं। भाटा हो गया, तथापि ध्यानभंग न हुआ। तेरह सौ भगतों में से एक सौ समझ गये थे कि वीरभद्र क्या कहेंगे। आचार्य की बात को टालना नहीं चाहिए, अतएव वे तो खिसक गए, वीरभद्र से साक्षात् नहीं किया। रहे बारह सौ भगत, वे वीरभद्र के पास लौटकर आए। वीरभद्र बोले, ‘ये तेरह सौ भगतिनें तुम्हारी सेवा करेंगी, तुम लोग इनसे विवाह करो।’ शिष्यों ने कहा, ‘जैसी आपकी आज्ञा; परन्तु हममें से एक सौ न जाने कहाँ चले गए।’ उन बारह सौ भगतों के साथ एक एक सेवादासी रहने लगी। फिर उनका वह तेज, तपस्याबल न रह गया। स्त्री के साथ रहने के कारण वह बल जाता रहा, क्योंकि