श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १४१
“यह महानिर्वाणतन्त्र में लिखा है।”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, इसकी धारणा करनी चाहिए।
(३)
श्रीरामकृष्ण का यशोदा-भाव तथा समाधि
श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर जा बैठे हैं। भाव में तो सदा ही पूर्ण रहते हैं। भावनेत्रों से राखाल को देख रहे हैं। देखते देखते हृदय में वात्सल्यरस उमड़ने लगा, अंग पुलकित होने लगे। क्या यशोदामाता इन्हीं नेत्रों से गोपाल को देखा करती थीं?
देखते ही देखते फिर आप समाधिलीन हो गए। कमरे के भीतर जितने भक्त बैठे हुए थे, वे सभी आश्चर्य से चकित और स्तब्ध होकर श्रीरामकृष्ण के भाव की यह अद्भुत अवस्था देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ होकर कहते हैं, – “राखाल को देखकर इतनी उद्दीपना क्यों होती हैं? जितना ही ईश्वर की ओर बढ़ते जाओगे, ऐश्वर्य की मात्रा उतनी ही घटती जाएगी। साधक पहले दशभुजा मूर्ति देखता है। वह ईश्वरी मूर्ति है। इसमें ऐश्वर्य का प्रकाश अधिक रहता है। इसके बाद द्विभुजा मूर्ति देखता है। तब दस हाथ नहीं रहते – इतने अस्त्र-शस्त्र नहीं रहते। इसके बाद गोपाल-मूर्ति के दर्शन होते हैं, कोई ऐश्वर्य नहीं – केवल एक छोटे बच्चे की मूर्ति। इससे भी परे है – केवल ज्योति-दर्शन।
यथार्थ ब्रह्मज्ञान की अवस्था – विचार और आसक्ति का त्याग
“उन्हें प्राप्त कर लेने पर, उनमें समाधिमग्न हो जाने पर, फिर ज्ञान-विचार नहीं रह जाता।
“ज्ञान-विचार तो तभी तक है, जब तक अनेक वस्तुओं की धारणा रहती है – जब तक जीव, जगत्, हम, तुम, यह ज्ञान रहता है। जब एकत्व का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब चुप हो जाना पड़ता है। जैसे त्रैलंगस्वामी।
“ब्रह्मभोज के समय नहीं देखा? पहले खूब गुलगपाड़ा मचता है। ज्यों-ज्यों पेट भरता जाता है, त्यों-त्यों आवाज घटती जाती है। जब दही आया, तब सुप्-सुप्, बस और कोई शब्द नहीं। इसके बाद ही निद्रा – समाधि! तब आवाज जरा भी नहीं रह जाती!
(मास्टर और प्राणकृष्ण से) – “कितने ही ऐसे हैं जो ब्रह्मज्ञान की डींग मारते हैं परन्तु नीचे स्तर की वस्तुएँ लेकर मग्न रहते हैं। – घर-द्वार, धनमान, इन्द्रियसुख। मोनूमेण्ट (Monument) के नीचे जब तक रहा जाता है, तब तक गाड़ी, घोड़ा, साहब, मेम – यही सब दीख पड़ते हैं। ऊपर चढ़ने पर सिर्फ आकाश, समुद्र लहराता हुआ दीख पड़ता है। तब घर-द्वार, घोड़ा-गाड़ी, आदमी – इन पर मन नहीं रमता, ये सब चींटी जैसे