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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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११ मार्च, १८८३परिच्छेद २६१५७

फिर आँगन से होते हुए अपने कमरे की तरफ आ रहे हैं। साथ में भवनाथ और मास्टर हैं। भवनाथ के हाथ में डाब है। रास्ते की दाहिनी ओर श्रीराधाकान्त का मन्दिर है, जिसे श्रीरामकृष्ण 'विष्णुघर' कहा करते थे। इन युगलमूर्तियों को देखकर आपने भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। बायीं ओर बारह शिवमन्दिर थे। शिवजी को हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगे।

अब श्रीरामकृष्ण अपने डेरे पर पहुँचे। देखा कि और भी कई भक्त आए हुए हैं। राम, नित्यगोपाल, केदार चटर्जी आदि अनेक लोग आए हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। आपने भी उनसे कुशल-प्रश्न पूछा।

नित्यगोपाल को देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "तू कुछ खाएगा?" ये भक्त उस समय बालक के भाव में थे। इन्होंने विवाह नहीं किया था, उम्र तेईस-चौबीस वर्ष की होगी। ये सदा भावराज्य में रहते थे और कभी अकेले, कभी राम के साथ प्रायः श्रीरामकृष्ण के पास आया करते थे। श्रीरामकृष्ण इनकी भावावस्था को देखकर इनसे बड़ा प्यार करते हैं – और कभी कभी कहते हैं कि इनकी परमहंस की अवस्था है। इसलिए आप इनको गोपाल जैसे देख रहे हैं।

भक्त ने कहा, "खाऊँगा।" उनकी बातें ठीक एक बालक की सी थीं।

नित्यगोपाल को उपदेश – त्यागी के लिए स्त्रीलिंग पूर्णतया निर्विघ्न

खिलाने के बाद श्रीरामकृष्ण उनको गंगा की ओर अपने कमरे के गोल बरामदे में ले गए और उनसे बातें करने लगे।

एक परम भक्त महिला, जिनकी उम्र कोई इकतीस-बत्तीस वर्ष की होगी, श्रीरामकृष्ण के पास अक्सर आती हैं और उनकी बड़ी भक्ति करती हैं। वे भी इन भक्त की अद्भुत भावावस्था को देखकर इन्हें अपने लड़के के भाँति प्यार करती हैं और इन्हें प्रायः अपने घर लिवा ले जाती हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्त से) – क्या तू वहाँ जाता है?

नित्यगोपाल (बालक की तरह) – हाँ, जाता हूँ। मुझे लिवा ले जाती है।

श्रीरामकृष्ण – अरे साधु सावधान! एक-आध बार जाना, बस। ज्यादा मत जाना, नहीं तो गिर पड़ेगा! कामिनी और कांचन ही माया है। साधु को स्त्रियों से बहुत दूर रहना चाहिए। वहाँ सब डूब जाते हैं। वहाँ ब्रह्मा और विष्णु तक लोटपोट हो जाते हैं।

भक्त ने सब सुना।

मास्टर (स्वगत) – क्या आश्चर्य की बात है! इन भक्त की परमहंस की अवस्था है – यह तो आप स्वयं ही कहते हैं। इतनी उच्च अवस्था होते हुए भी इनके पतन की आशंका है! साधुओं के लिए आपने क्या ही कठिन नियम बना दिये हैं! स्त्रियों के साथ