श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ अप्रैल, १८८३
ही सीख लेता है! वैद्य के पीछे महीनों घूमना पड़ता है। तभी वह कह सकता है, कौन कफ की नाड़ी है, कौन पित्त की है और कौन वात की है। नाड़ी देखना जिनका पेशा है, उनका संग करना चाहिए। (सब हँसते हैं।)
“क्या सभी पहचान सकते हैं कि यह अमुक नम्बर का सूत है? सूत का व्यवसाय करो, जो लोग व्यवसाय करते हैं, उनकी दूकान में कुछ दिन रहो, तो कौन चालीस नम्बर का सूत है, कौन इकतालीस नम्बर का, तुरन्त कह सकोगे।”
(२)
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द। समाधि में
अब संकीर्तन होगा। मृदंग बजाया जा रहा है। गोष्ठ मृदंग बजा रहा है। अभी गाना शुरू नहीं हुआ। मृदंग का मधुर वाद्य गौरांगमण्डल और उनके नामसंकीर्तन की याद दिलाकर मन को उद्दीप्त करता है। श्रीरामकृष्ण भाव में मग्न हो रहे हैं। रह-रहकर मृदंगवादक पर दृष्टि डालकर कह रहे हैं – “अहा! मुझे रोमांच हो रहा है!”
गवैयों ने पूछा, “कैसा पद गाएँ?” श्रीरामकृष्ण ने विनीत भाव से कहा, “जरा गौरांग के कीर्तन गाओ।”
कीर्तन आरम्भ हो गया। पहले गौरचन्द्रिका होगी, फिर दूसरे गाने।
कीर्तन में गौरांग के रूप का वर्णन हो रहा है। कीर्तन-गवैये अन्तरों में चुन-चुनकर अच्छे पद जोड़ते हुए गा रहे हैं – “सखि, मैंने पूर्णचन्द्र देखा”, “न हास है – न मृगांक”, “हृदय को आलोकित करता है।”
गवैयों ने फिर गाया – “कोटि चन्द्र के अमृत से उसका मुख धुला हुआ है।”
श्रीरामकृष्ण यह सुनते ही सुनते समाधिमग्न हो गए।
गाना होता ही रहा। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। वे भाव में मग्न होकर एकाएक उठकर खड़े हो गए तथा प्रेमोन्मत्त गोपिकाओं की तरह श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन करते हुए कीर्तन-गवैयों के साथ साथ गाने लगे – “सखि! रूप का दोष है या मन का?” “दूसरों को देखती हुई तीनों लोक में श्याम ही श्याम देखती हूँ।”
श्रीरामकृष्ण नाचते हुए गा रहे हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर देख रहे हैं। गवैये फिर गा रहे है, – गोपिका की उक्ति – “बंसी री! तू अब न बज। क्या तुझे नींद भी नहीं आती?” इसमें पद जोड़कर गा रहे हैं – “और नींद आए भी कैसे!” – “सेज तो करपल्लव है न?” – “श्रीमुख के अमृत का पान करती है” – “तिस पर उँगलियाँ सेवा करती हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने आसन ग्रहण किया। कीर्तन होता रहा। श्रीमती राधा की उक्ति गायी जाने लगी। वे कहती हैं – “दृष्टि, श्रवण और घ्राण की शक्ति तो चली गयी – सभी