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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ३१

सींती के ब्राह्मसमाज में ब्राह्मभक्तों के साथ

(१)

संसार में निष्काम कर्म

श्रीरामकृष्ण ने श्री वेणी पाल के सींती के बगीचे में शुभागमन किया है। आज सींती के ब्राह्मसमाज का छःमाही महोत्सव है। रविवार, चैत्र पूर्णिमा, २२ अप्रैल १८८३। तीसरे प्रहर का समय। अनेक ब्राह्मभक्त उपस्थित हैं। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को घेरकर दक्षिण के बरामदे में आ बैठे। सायंकाल के बाद आदिसमाज के आचार्य श्री बेचाराम उपासना करेंगे। ब्राह्मभक्तगण बीच बीच में श्रीरामकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं।

ब्राह्मभक्त – महाराज, मुक्ति का उपाय क्या है?

श्रीरामकृष्ण – उपाय अनुराग, अर्थात् उनसे प्रेम करना, और प्रार्थना।

ब्राह्मभक्त – अनुराग या प्रार्थना?

श्रीरामकृष्ण – अनुराग पहले, फिर प्रार्थना।

श्रीरामकृष्ण सुर के साथ गाना गाने लगे जिसका भावार्थ यह है, – 'हे मन, पुकारने की तरह पुकारो तो देखूँ श्यामा कैसे रह सकती हैं!' फिर बोले –

“और सदा ही उनका नामगुणगान, कीर्तन और प्रार्थना करनी चाहिए। पुराने लोटे को रोज माँजना होगा, एक बार माँजने से क्या होगा? और विवेक-वैराग्य तथा संसार अनित्य है यह बुद्धि चाहिए।”

ब्राह्मभक्त – संसार छोड़ना क्या अच्छा है?

श्रीरामकृष्ण – सभी के लिए संसारत्याग ठीक नहीं। जिनके भोग का अन्त नहीं हुआ, उनसे संसारत्याग नहीं होता। रत्ती भर शराब से क्या मस्ती आती है?

ब्राह्मभक्त – तो फिर वे लोग क्या संसार करेंगे?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे लोग निष्काम कर्म करने की चेष्टा करें। हाथ में तेल मलकर कटहल छीलें। धनियों के घर में दासियाँ सब काम करती हैं, परन्तु मन रहता है अपने निज