भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 232

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

२ जून, १८८३परिच्छेद ३५२०९

रामचन्द्र श्रीरामकृष्ण को वैशाख की पूर्णिमा को, जिस समय हिण्डोले का श्रृंगार होता है, इस मकान में उनकी पूजा करने के लिए सर्वप्रथम ले आये थे। प्रायः प्रतिवर्ष आज के दिन वे उनको ले जाकर भक्तों से सम्मिलित हो महोत्सव मनाया करते थे। रामचन्द्र के प्यारे शिष्यवृन्द अब भी उस दिन उत्सव मनाते हैं।

आज रामचन्द्र के मकान में उत्सव है! श्रीरामकृष्ण आयेंगे। आपके लिए रामचन्द्र ने श्रीमद्भागवत की कथा का प्रबन्ध किया है। छोटासा आँगन है, परन्तु उसी में कैसा सुन्दर सजाया है! वेदी तैयार हुई है, उस पर कथक महोदय बैठे हैं। राजा हरिश्चन्द्र की कथा हो रही है। इसी समय बलराम और अधर के मकान से होकर श्रीरामकृष्ण यहाँ आ पहुँचे। रामचन्द्र ने आगे बढ़कर उनकी चरणरज को मस्तक में धारण किया और वेदी के संम्मुख उनके लिए निर्दिष्ट आसन पर उन्हें लाकर बैठाया। चारों ओर भक्त और पास ही मास्टर बैठे हैं।

राजा हरिश्चन्द्र की कथा होने लगी —

“विश्वामित्र बोले, ‘महाराज! तुमने मुझे ससागर पृथ्वी दान कर दी है, इसलिए अब इसके भीतर तुम्हारा स्थान नहीं है; किन्तु तुम काशीधाम में रह सकते हो, वह महादेव का स्थान है। चलो, तुम्हें और तुम्हारी सहधर्मिणी शैब्या और तुम्हारे पुत्र को वहाँ पहुँचा दें। वहीं पर जाकर तुम प्रबन्ध करके मुझे दक्षिणा दे देना।’ यह कहकर राजा को साथ ले विश्वामित्र काशीधाम की ओर चले। काशी में आकर उन लोगों ने विश्वेश्वर के दर्शन किये।”

विश्वेश्वर-दर्शन की बात होते ही श्रीरामकृष्ण एकदम भावाविष्ट हो अस्पष्ट रूप से ‘शिव’ ‘शिव’ उच्चारण कर रहे हैं।

कथक महोदय कथा कहते गए —

“राजा हरिश्चन्द्र दक्षिणा नहीं दे पाए, इसलिए उन्होंने रानी शैब्या को बेच दिया। पुत्र रोहिताश्व भी शैब्या के साथ चला गया।”

कथक महोदय ने शैव्या के ब्राह्मण मालिक के यहाँ रोहिताश्व के फूल तोड़ने और उसे साँप के द्वारा काटे जाने की कथा कही। —

“उस अन्धकाराच्छन्न कालरात्रि में सन्तान की मृत्यु हो गयी। उसका अन्तिम संस्कार करने के लिए कोई नहीं था। गृहस्वामी वृद्ध ब्राह्मण शय्या त्यागकर नहीं उठे। पुत्र के शव को गोद में लिए शैब्या अकेली ही श्मशान की ओर चल पड़ी। बीच बीच में बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। एक एक बार घोर अन्धकार को चीरती हुई बिजली चमक दिखा जाती थी। भयभीत, शोकाकुल शैब्या रोती हुई चली जा रही थी।”

“पत्नी और पुत्र को बेचने पर भी दक्षिणा की राशि पूरी न होने पायी; इसलिए हरिश्चन्द्र ने स्वयं को एक चाण्डाल को बेच डाला था। वे श्मशान में चाण्डाल बने बैठे


CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar