श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामकृष्णवचनामृत
(प्रथम भाग)
परिच्छेद १
प्रथम दर्शन
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः।।
(श्रीमद्भागवत, १०।३१।९)
श्रीगंगाजी के पूर्वतट पर कलकत्ते से कोई छः मील दूर दक्षिणेश्वर में श्रीकालीजी का मन्दिर है। यहीं भगवान् श्रीरामकृष्णदेव रहते हैं। वसन्त ऋतु है। १८८२ ईसवीं का फरवरी माह। श्रीरामकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद कुछ दिन बीत चुके हैं। श्री केशवचन्द्र सेन और ज़ोसेफ कुक के साथ २३ फरवरी, बृहस्पतिवार के दिन श्रीरामकृष्ण जहाज में बैठकर घूमने गए थे। इसके कुछ ही दिन बाद (२६ फरवरी) की घटना है।
सन्ध्या का समय था। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश किया। इसी समय उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव के प्रथम बार दर्शन किए। उन्होंने देखा, कमरा लोगों से भरा हुआ है; सब लोग चुपचाप बैठे उनके वचनामृत का पान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण तखत पर पूर्व की ओर मुँह किये बैठे हुए प्रसन्नवदन हो ईश्वरीय चर्चा कर रहे हैं। भक्तगण फर्श पर बैठे हुए हैं।
कर्मत्याग कब होता है?
मास्टर खड़े खड़े आश्चर्यमुग्ध होकर देखने लगे। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, मानो साक्षात् शुकदेव भगवत्-प्रसंग कर रहे हैं तथा उस स्थान पर सभी तीर्थों का समागम हुआ है अथवा मानो श्रीचैतन्यदेव पुरीधाम में रामानन्द, स्वरूप आदि भक्तों के साथ बैठकर भगवान् का नामगुणगान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कह रहे थे – "जब एक बार हरिनाम या रामनाम लेते ही रोमांच होता है, आँसुओ की धारा बहने लगती है, तब निश्चित समझो