श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६ फरवरी, १८८२ | परिच्छेद १ | ३ |
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मास्टर – अच्छा, तो पुस्तकें खूब पढ़ते होंगे?
वृन्दा – पुस्तकें? उनके मुँह में सब कुछ है।
मास्टर हाल ही में पढ़ाई-लिखाई पूरी कर आए थे। श्रीरामकृष्ण पुस्तकें नहीं पढ़ते, यह सुनकर उन्हें और भी आश्चर्य हुआ।
मास्टर – अब तो ये शायद सन्ध्या करेंगे? क्या हम भीतर जा सकते हैं? एक बार खबर दे दो न।
वृन्दा – तुम लोग जाते क्यों नहीं? – जाओ, भीतर बैठो।
तब दोनों ने कमरे में प्रवेश किया। देखा, कमरे में और कोई नहीं है। श्रीरामकृष्ण अकेले तख्त पर बैठे हैं। कमरे में धूप की सुगन्ध भर रही है। सभी दरवाजे बन्द हैं। मास्टर ने अन्दर आते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण द्वारा बैठने की आज्ञा पाकर वे और सिधू फर्श पर बैठ गए। श्रीरामकृष्ण ने पूछा, कहाँ रहते हो, क्या करते हो, वराहनगर क्यों आए इत्यादि। मास्टर ने कुल परिचय दिया। वे देखने लगे कि श्रीरामकृष्ण का मन बीच बीच में मानो दूसरी ओर खिंच रहा है। उन्हें बाद में मालूम हुआ कि इसी को ‘भाव’ कहते हैं। मानो कोई बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा है जब मछली आकर काँटे में लगे चारे को खाने लगती है और बंसी का शोला हिलने लगता है, उस समय वह आदमी किस प्रकार व्यस्त होकर बंसी को पकड़े हुए एकाग्र चित्त से शोले की ओर टक लगाकर देखने लगता है, – किसी से बातचीत नहीं करता यह भी ठीक उसी प्रकार का भाव था। बाद में मास्टर ने सुना और देखा कि सन्ध्या के बाद श्रीरामकृष्ण को इस प्रकार का भावान्तर प्रायः प्रतिदिन हुआ करता है, कभी कभी तो वे पूरी तरह बाह्यज्ञान-शून्य हो जाते हैं।
मास्टर – आप तो अब सन्ध्या करेंगे, हम अब चलें।
श्रीरामकृष्ण (भावस्थ) – नहीं, – सन्ध्या – ऐसा कुछ नहीं।
और कुछ देर बातचीत होने के बाद मास्टर ने प्रणाम किया और चलना चाहा। श्रीरामकृष्ण ने कहा, “फिर आना।”
मास्टर लौटते समय सोचने लगे – “ये सौम्यदर्शन पुरुष कौन हैं? – इनके पास फिर लौट जाने की इच्छा हो रही है! क्या बिना पुस्तकों के पढ़े भी मनुष्य महान् बन सकता है? कितना आश्चर्य है, मुझे यहाँ फिर आने की इच्छा हो रही है इन्होंने भी कहा, 'फिर आना' कल या परसों सबेरे फिर आऊँगा।”