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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २५९

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर की सृष्टि में सब कुछ हो सकता है – यह विश्वास ही पर्याप्त है। मैं जो सोचता हूँ वही सत्य है, और सब का मत मिथ्या है – ऐसा भाव मन में न आने देना। बाकी ईश्वर ही समझा देंगे।

“ईश्वर के कार्यों को मनुष्य क्या समझेगा? उनके कार्य अनन्त हैं! इसलिए मैं इनको समझने का थोड़ा भी प्रयत्न नहीं करता। मैंने सुन रखा है कि उनकी सृष्टि में सब कुछ हो सकता है। इसीलिए मैं इन सब बातों की चिन्ता न कर केवल ईश्वर ही की चिन्ता करता हूँ। हनुमान से पूछा गया था, आज कौनसी तिथि है; हनुमान ने कहा था, मैं तिथि, नक्षत्र आदि नहीं जानता, केवल एक राम की चिन्ता करता हूँ।

“ईश्वर के कार्य क्या समझ में आ सकते हैं? वे तो पास ही हैं – पर यह समझना कितना कठिन है! बलराम कृष्ण को भगवान् नहीं जानते थे।”

मणि – जी हाँ! जैसे आपने भीष्मदेव की बात कही थी।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, हाँ! क्या कहा था, कहो तो!

मणि – भीष्मदेव शरशय्या पर पड़े रो रहे थे। पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से कहा, ‘भाई, यह कैसा आश्चर्य है! पितामह इतने ज्ञानी होकर भी मृत्यु का विचार कर रो रहे हैं!’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘उनसे पूछो न, क्यों रोते हैं।’ भीष्मदेव बोले, ‘मैं यह विचार कर रोता हूँ कि भगवान् के कार्य को कुछ भी न समझ सका। हे कृष्ण, तुम इन पाण्डवों के साथ साथ फिरते हो, पग पग पर इनकी रक्षा करते हो, फिर भी इनकी विपद् का अन्त नहीं!’

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर ने अपनी माया से सब कुछ ढक रखा है – कुछ जानने नहीं देते। कामिनी और कांचन ही माया है। इस माया को हटाकर जो ईश्वर के दर्शन करता है, वही उन्हें देख पाता है। एक आदमी को समझाते समय मुझे ईश्वर ने एक अद्भुत दृश्य दिखलाया। अचानक सामने देखा उस देश का एक तालाब, और एक आदमी ने काई हटाकर उससे जल पी लिया। जल स्फटिक की तरह साफ था। इससे यह सूचित हुआ कि वह सच्चिदानन्द मायारूपी काई से ढका हुआ है, – जो काई हटाकर जल पीता है, वही पाता है।

“सुनो, तुमसे बड़ी गूढ़ बातें कहता हूँ। झाउओ के तले बैठे हुए देखा कि चोर दरवाजे का-सा एक दरवाजा सामने है। कोठरी के अन्दर क्या है, यह मुझे दिखायी नहीं पड़ा। मैं एक नहेरनी से छेद करने लगा, पर कर न सका। मैं छेदता रहा, पर वह बार बार भर जाता था। परन्तु एक बार इतना बड़ा छेद बना!”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण चुप रहे। फिर बोलने लगे – “ये सब बड़ी ऊँची बातें हैं। यह देखो, कोई मानो मेरा मुँह दबा देता है।

“योनि में ईश्वर का वास प्रत्यक्ष देखा था! – कुत्ता और कुतिया के समागम के समय देखा था।

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