श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ जुलाई, १८८३
(भावार्थ) – “हे माँ, तुम आनन्दमयी होते हुए मुझे निरानन्द मत करना।”
गीत समाप्त होने पर भावोन्मत्त होकर यदु से कहते हैं, “क्यों बाबू, क्या गाऊँ? ‘माँ, आमिकि आटाशे छेले’ – यह गाना गाऊँ?” यह कहकर आप गाने लगे –
(भावार्थ) – “माँ, क्या मैं तेरा अठवाँसा* बालक हूँ? तेरे आँखें तरेरने से मैं नहीं डरता। शिव जिन्हें अपने हृदयकमल पर धारण करते हैं वे तेरे आरक्त चरण मेरी सम्पदा हैं। ...”
भाव का किंचित उपशम होने पर श्रीरामकृष्ण कहते हैं, “माँ का प्रसाद खाऊँगा।” तब आपको सिंहवाहिनी का प्रसाद ला दिया गया।
यदु मल्लिक बैठे हैं। पास ही कुछ मित्र बैठे हुए हैं; कुछ खुशामद करनेवाले मुसाहब भी हैं।
यदु मल्लिक की ओर मुँह कर श्रीरामकृष्ण कुर्सी पर बैठे हैं और हँसते हुए बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ आये हुए भक्तों में से कोई कोई बाजू के कमरे में हैं। मास्टर तथा और दो-एक भक्त श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अच्छा, तुम मुसाहब क्यों रखते हो?
यदु (सहास्य) – मुसाहब रखने में क्या हर्ज है! क्या तुम उद्धार नहीं करोगे?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – शराब की बोतलों के आगे गंगा भी हार मानती है!
यदु ने श्रीरामकृष्ण के सम्मुख घर में चण्डी-गान का आयोजन करने का वचन दिया था। बहुत दिन बीत गये, पर चण्डी-गान नहीं हुआ।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, चण्डी-गान का क्या हुआ?
यदु – कई तरह के काम-काज थे, इसीलिए इतने दिन नहीं हो पाया।
श्रीरामकृष्ण – यह क्या! मर्द आदमी की एक जबान चाहिए! ‘पुरुष की बात, हाथी का दाँता।’ मर्द की जबान एक चाहिए – क्यों, ठीक है न?
यदु (सहास्य) – सो तो ठीक है।
श्रीरामकृष्ण – तुम बड़े हिसाबी आदमी हो। बहुत हिसाब करके काम करते हो। ब्राह्मण की गाय – खाये कम, गोबर ज्यादा करे, और धर-धर दूध दे! (सब हँसते हैं।)
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण यदु से कहते हैं, “समझ गया। तुम रामजीवनपुर की सिल के जैसे हो – आधी गरम, आधी ठण्डी। तुम्हारा मन ईश्वर की भी ओर है, और संसार की भी ओर।
श्रीरामकृष्ण ने एक-दो भक्तों के साथ यदु के मकान पर फल, मिष्टान्न, खीर आदि प्रसाद ग्रहण किया। अब आप खेलात घोष के यहाँ जायेंगे।
* आठ महीने में जन्म लेनेवाला बच्चा दुर्बल और भीरु होता है।