भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 711 में से

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पृष्ठ 290
२१ जुलाई, १८८३परिच्छेद ४६२६७

“हे ईश्वर, तुम कर्ता हो, मैं अकर्ता' – यही ज्ञान है। 'हे ईश्वर, सब कुछ तुम्हारा है; देह, मन, घर, परिवार, जीव, जगत् – यह सब तुम्हारा ही है, मेरा कुछ नहीं' – इसी का नाम ज्ञान है।

“जो अज्ञानी है, वही कहता है कि ईश्वर 'वहाँ' – बहुत दूर हैं। जो ज्ञानी है, वह जानता है कि ईश्वर 'यहाँ' – अत्यन्त निकट, हृदय के बीच अन्तर्यामी के रूप में विराजमान हैं, फिर उन्होंने स्वयं भिन्न भिन्न रूप भी धारण किये हैं।”

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