भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७५

“उत्तम भक्त कौन है? जो ब्रह्मज्ञान के बाद देखता है कि ईश्वर ही जीव, जगत् और चौबीस तत्त्व हुए हैं। पहले ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) करके विचार करते हुए छत पर पहुँचना पडता है। फिर वही आदमी देखता है कि छत जिन चीजों - ईंट, चूने और सुरखी - से बनी है, सीढ़ी भी उन्हीं से बनी है। तब वह देखता है कि ब्रह्म ही जीव, जगत और सब कुछ है।

“केवल शुष्क विचार! मैं उस पर थूकता हूँ। (आप जमीन पर थूकते हैं।)

“क्यों विचार कर शुष्क बना रहूँगा! जब तक ‘मैं’ और ‘तुम’ है, तब तक प्रार्थना है कि ईश्वर के चरणकमलों में शुद्धा भक्ति बनी रहे।

(गोविन्द से) “कभी कहता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और ‘मैं’ ही ‘तुम’ हूँ। फिर कभी ‘तुम्हीं तुम हो’ - ऐसा हो जाता है! इस समय अपने अहं को ढूँढ़ नहीं पाता।

“शक्ति का ही अवतार होता है। एक मत से राम और कृष्ण चिदानन्द समुद्र की दो लहरें हैं।

“अद्वैतज्ञान के बाद चैतन्य होता है। तब मनुष्य देखता है कि ईश्वर ही सब प्राणियों में चैतन्य रूप से विद्यमान हैं। चैतन्यलाभ के बाद आनन्द होता है - ‘अद्वैत-चैतन्य-नित्यानन्द’।*

(मास्टर से) “और तुमसे कहता हूँ - ईश्वर के रूप पर अविश्वास मत करना। यह विश्वास करना कि ईश्वर के रूप हैं, फिर जो रूप तुम्हें पसन्द हो उसी का ध्यान करना।

(गोविन्द से) “बात यह है कि जब तक भोग-वासना बनी रहती है, तब तक ईश्वर को जानने या उनके दर्शन करने के लिए प्राण व्याकुल नहीं होते। बच्चा खेल में मग्न रहता है। मिठाई देकर बहलाओ तो थोड़ीसी खा लेगा। जब उसे न खेल अच्छा लगता है न मिठाई, तब वह कहता है, ‘माँ के पास जाऊँगा।’ फिर वह मिठाई नहीं चाहता। अगर कोई आदमी, जिसे उसने न कभी देखा है और न पहचानता है, आकर कहे, ‘आ, तुझे माँ के पास ले चलूँ’, तो वह उसके साथ चला जाएगा। जो कोई उसे गोद में बिठाकर ले जायगा, वह उसी के साथ जाएगा।

“संसार के भोग समाप्त हो जाने के बाद ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। उस समय केवल एक चिन्ता रहती है कि किस तरह उन्हें पाऊँ। उस समय जो जैसा बताता है, मनुष्य वैसा ही करने लगता है।”

मास्टर (स्वगत) - भोगवासना समाप्त हो चुकने के बाद ही ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं।


* पन्द्रहवीं शताब्दी में नदिया में तीन महापुरुष भी इन्हीं नामों के हुए थे। उनमें श्रीचैतन्य भगवान् के अवतार समझे जाते हैं। शेष दो उनके पार्षद थे।