श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
DevanagariHindipublished711 पृष्ठ
पृष्ठ 301, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 301
२७८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ अगस्त, १८८३
आता है और फिर निकल जाता है। यहाँ पर पाताल से निकले हुए स्वयम्भू शिव हैं, स्थापित किए हुए शिव नहीं हैं। तू क्रोध में दक्षिणेश्वर से चला आया; मैंने माँ से कहा, 'माँ, इसके अपराध पर ध्यान न देना।'
क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं? स्वयम्भू शिव हैं?
फिर भावविभोर होकर अधर से कह रहे हैं – “भैया, तुमने जो नाम लिया था, उसी का ध्यान करो।” ऐसा कहकर अधर की जिव्हा अपनी उँगली से छूकर उस पर न जाने क्या लिख दिया। क्या यही अधर की दीक्षा हुई?