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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 305
२८२श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ अगस्त, १८८३

ऐश्वर्य रहता है। वह ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होता। देखो, पाण्डवों पर कितनी विपत्ति पड़ी, पर इतने पर भी उनका चैतन्य एक बार भी नष्ट नहीं हुआ। उनकी तरह ज्ञानी, उनकी तरह भक्त कहाँ मिल सकते हैं?

(३)

कप्तान और नरेन्द्र का आगमन

इसी समय नरेन्द्र और विश्वनाथ उपाध्याय आये। विश्वनाथ नेपालराजा के वकील थे – राजप्रतिनिधि थे। श्रीरामकृष्ण इन्हें कप्तान कहा करते थे। नरेन्द्र की आयु लगभग इक्कीस वर्ष की है – इस समय वे बी. ए. में पढ़ते हैं। बीच बीच में, विशेषतः रविवार को दर्शन के लिए आ जाते हैं।

जब वे प्रणाम करके बैठ गए तो श्रीरामकृष्णदेव ने नरेन्द्र से गाना गाने के लिए कहा। कमरे के पश्चिम ओर एक तम्बूरा लटका हुआ था। यन्त्रों का सुर मिलाया जाने लगा। सब लोग एकाग्र होकर गवैये की ओर देखने लगे कि कब गाना आरम्भ होता है।

श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र से) – देख, यह अब वैसा नहीं बजता।

कप्तान – यह पूर्ण होकर बैठा है, इसी से इसमें शब्द नहीं होता! (सब हँसे।) पूर्णकुम्भ है!

श्रीरामकृष्ण (कप्तान से) – पर नारदादि कैसे बोले?

कप्तान – उन्होंने दूसरों के दुःख से कातर होकर उपदेश दिए थे।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, नारद, शुकदेव आदि समाधि के बाद नीचे उतर आए थे। दया के कारण, दूसरों के हित की दृष्टि से उन्होंने उपदेश दिए थे।

नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। गाने का आशय इस प्रकार था – "सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में चमक रहा है। उसे देख-देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जायेंगे। वह दिन कब होगा? हे नाथ, जब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में प्रवेश करोगे, तब हमारा अस्थिर मन निर्वाक् होकर तुम्हारे चरणों मे शरण लेगा। आनन्द और अमृतत्व के रूप में जब तुम हमारे हृदयाकाश में उदित होगे, तब चन्द्रोदय में जैसे चकोर उमंग से खेलता फिरता है, वैसे हम भी, नाथ, तुम्हारे प्रकाशित होने पर आनन्द मनाएंगे।" इत्यादि।

'आनन्द और अमृतत्व के रूप में' ये शब्द सुनते ही श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गए। आप हाथ बाँधे पूर्व की ओर मुँह किए बैठे हैं। देह सरल और निश्चल है। आनन्दमयी के रूपसमुद्र में आप डूब गए हैं। बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं है। साँस अत्यन्त मन्द चल रही है। नेत्र पलकहीन हैं। आप चित्रवत् बैठे हैं। मानो इस राज्य को छोड़ कहीं और चले गये हैं।