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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१९ अगस्त, १८८३परिच्छेद ४९२८५

नरेन्द्र – दर्शनशास्त्रों का पठन समाप्त होने पर मनुष्य पण्डितमूर्ख बन बैठता है; और 'धर्म धर्म' करने लगता है। तब धर्म का आरम्भ होता है।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – थैंक यू, थैंक यू (धन्यवाद, धन्यवाद)! (सब लोग हँसे।)

(६)

नरेन्द्र के अनेक गुण

थोड़ी देर में सन्ध्या होते देखकर अधिकांश लोग अपने अपने घर लौटे। नरेन्द्र ने भी विदा ली।

दिन ढलने लगा। सन्ध्या होने ही वाली है। देवस्थान में चारों ओर बत्तियाँ जलाने का प्रबन्ध होने लगा। कालीमन्दिर और विष्णुमन्दिर के पुजारी गंगाजी में अर्धनिमग्न होकर अन्तरबाह्य शुद्धि कर रहे हैं – शीघ्र ही आरती करनी होगी तथा देवताओं को रात्रिकालीन नैवेद्य चढ़ाना होगा। दक्षिणेश्वर ग्राम के निवासी युवकगण बगीचे में टहलने आए हुए हैं – किसी के हाथ में छड़ी है, तो कोई मित्रों के साथ घूम रहा है। वे लोग गंगा के किनारे पुश्ते पर टहल रहे हैं तथा पुष्पों की सुगन्ध से भरे निर्मल सन्ध्या-समीरण का आनन्द लेते हुए श्रावण की गंगा के तरंगमय प्रवाह को देख रहे हैं। उनमें से जो कुछ चिन्तनशील हैं वे पंचवटी की निर्जन भूमि में अकेले टहल रहे हैं। भगवान् श्रीरामकृष्ण भी पश्चिमवाले बरामदे से थोड़ी देर के लिए गंगादर्शन करने लगे।

सन्ध्या हुई। नौकर बत्तियाँ जला गया। दासी ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में दीप जलाकर धूनी दी। बारह शिवमन्दिरों में आरती होते ही विष्णु तथा काली के मन्दिर में आरती होने लगी। घण्टा, घड़ियाल आदि का मधुर गम्भीर नाद उठने लगा – मन्दिर के निकट ही बहती हुई गंगा का कलकलनिनाद तो गूँज ही रहा था।

श्रावण की कृष्णा प्रतिपदा है। थोड़ी ही देर में चाँद निकला। विशाल प्रांगण तथा उद्यान के वृक्ष धीरे धीरे चन्द्रकिरण से आप्लावित हो गए। ज्योत्स्ना के स्पर्श से भागीरथी का जल मानो प्रफुल्लित होकर बह रहा है।

सन्ध्या होते ही श्रीरामकृष्ण जगन्माता को प्रणाम करके तालियाँ बजाते हुए हरिध्वनि करने लगे। कमरे में बहुतसे देवदेवियों की तस्वीरें थी – जैसे ध्रुव और प्रह्लाद की, राजाराम की, कालीमाता की, राधाकृष्ण की – आपने सभी देवताओं को उनके नाम ले-लेकर प्रणाम किया। फिर कहने लगे, 'ब्रह्म-आत्मा, भगवान् भागवत-भक्त-भगवान्, ब्रह्म-शक्ति, शक्ति-ब्रह्म; वेद-पुराण-तन्त्र; गीता-गायत्री; मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; नाहं नाहं (मैं नहीं, मैं नहीं), तू ही, तू ही; मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो'; इत्यादि।

नामोच्चारण के बाद श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर जगन्माता का चिन्तन करने लगे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar