श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० अगस्त, १८८३ परिच्छेद ५० २८९
नहीं देता – किसी को झमेले में नहीं डालता। किसी-किसी का ऐसा स्वभाव है कि कहीं न्यौता खाने गया हो तो शायद कह दिया – मैं अलग बैठूँगा! ईश्वर पर यथार्थ भक्ति रहने से ताल के विरुद्ध पैर नहीं पड़ते – मनुष्य किसी को झूठमूठ कष्ट नहीं देता।
“दुष्ट लोगों का संग करना अच्छा नहीं। उनसे अलग रहना पड़ता है। अपने को उनसे बचाकर चलना पड़ता है। (मास्टर से) तुम्हारा क्या मत है?”
मास्टर – जी, दुष्टों के संग रहने से मन बहुत गिर जाता है। हाँ, जैसा आपने कहा, वीरों की बात दूसरी है।
श्रीरामकृष्ण – कैसे?
मास्टर – कम आग में थोड़ीसी लकड़ी डाल दो तो वह बुझ जाती है। पर धधकती हुई आग में केले का पेड़ भी झोंक देने से आग का कुछ नहीं बिगड़ता। वह पेड़ ही जलकर भस्म हो जाता है।
श्रीरामकृष्ण मास्टर के मित्र हरिबाबू की बात पूछ रहे हैं।
मास्टर – ये आपके दर्शन करने आये हैं। ये बहुत दिनों से विपत्नीक हैं।
श्रीरामकृष्ण (हरिबाबू से) – तुम क्या काम करते हो?
मास्टर ने उनकी ओर से कहा, “ऐसा कुछ नहीं करते, पर अपने माता-पिता, भाई-बहन आदि की बड़ी सेवा करते हैं।”
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – यह क्या है! तुम तो ‘कुम्हड़ा काटनेवाले जेठजी’ बने! तुम न संसारी हुए, न हरिभक्त। यह अच्छा नहीं। किसी किसी परिवार में एक पुरुष होता है, जो रातदिन लड़के-बच्चों से घिरा रहता है। वह बाहरवाले कमरे में बैठकर खाली तम्बाकू पिया करता है। निकम्मा ही बैठा रहता है। हाँ, कभी कभी अन्दर जाकर कुम्हड़ा काट देता है! स्त्रियों के लिए कुम्हड़ा काटना मना है। इसीलिए वे लड़कों से कहती हैं, ‘जेठजी को यहाँ बुला लाओ, वे कुम्हड़ा काट देंगे।’ तब वह कुम्हड़े के दो टुकड़े कर देता है! बस, यहीं तक मर्द का व्यवहार है। इसलिए उसका नाम ‘कुम्हड़ा काटनेवाले जेठजी’ पड़ा है।
“तुम यह भी करो, वह भी करो। ईश्वर के चरणकमलों में मन रखकर संसार का कामकाज करो। और जब अकेले रहो तब भक्तिशास्त्र पढ़ा करो – जैसे श्रीमद्भागवत या चैतन्यचरितामृत आदि।”
रात के लगभग दस बजे हैं। अभी कालीमन्दिर बन्द नहीं हुआ है। मास्टर ने राम चटर्जी के साथ जाकर पहले राधाकान्त के मन्दिर में और फिर कालीमाता के मन्दिर में प्रणाम किया। चाँद निकला था। श्रावण की कृष्णा द्वितीया थी। आँगन और मन्दिरों के शीर्ष बड़े सुन्दर दिखते थे।