श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ सितम्बर, १८८३
“परन्तु निराकारवादियों की भूल क्या है जानते हो? भूल यह है कि वे कहते हैं, ‘ईश्वर निराकार हैं, और बाकी सारे मत गलत हैं।’ ”
“मैं जानता हूँ, वे साकार निराकार दोनों ही हैं, और भी कितने प्रकार के बन सकते हैं! वे सब कुछ बन सकते हैं।”
(ईशान के प्रति) – “वही चित्शक्ति, वही महामाया चौबीस तत्त्व बनी हुई है। मैं ध्यान कर रहा था, ध्यान करते करते मन चला गया। रसके के घर में। रसके मेहतर है। मन से कहा, ‘अरे, रह, वहीं पर रह’। माँ ने दिखा दिया, उसके घर में जो लोग घूम रहे हैं, वे बाहर का आवरण मात्र हैं, भीतर वही एक कुलकुण्डलिनी, एक षट्चक्र है।
“वह आद्याशक्ति स्त्री है या पुरुष? मैंने उस देश में देखा, लाहाओ के घर पर कालीपूजा हो रही है। माँ के गले में जनेऊ दिया है। एक व्यक्ति ने पूछा, ‘माँ को जनेऊ क्यों है?’ जिसके घर में पूजा है उसने कहा, ‘भाई, तूने माँ को ठीक पहचाना है, परन्तु मैं तो कुछ भी नहीं जानता कि माँ पुरुष है या स्त्री!’
“इस प्रकार कहा जाता है कि महामाया शिव को निगल गयी। माँ के भीतर षट्चक्र का ज्ञान होने पर शिव माँ की जाँघ में से निकल आए। फिर शिव ने तन्त्रों की रचना की।”
“उस चित्शक्ति के, इस महामाया के शरणागत होना चाहिए।”
ईशान – आप कृपा कीजिए।
‘डुबकी लगाओ’। गुरु का प्रयोजन। शास्त्राध्ययन
श्रीरामकृष्ण – सरल भाव से कहो, ‘हे ईश्वर, दर्शन दो’ और रोओ और कहो, ‘हे ईश्वर, कामिनी-कांचन से मन को हटा दो।’
“और डुबकी लगाओ। ऊपर ऊपर बहने से या तैरने से क्या रत्न मिलता है? डुबकी लगानी पड़ती है।”
“गुरु से पता लेना चाहिए। एक व्यक्ति बाणलिंग शिव की खोज कर रहा था। किसी ने कह दिया, ‘अमुक नदी के किनारे जाओ, वहाँ पर एक वृक्ष देखोगे, उस वृक्ष के पास एक भँवर है। वहाँ पर डुबकी लगानी होगी, तब बाणलिंग शिव मिलेगा।’ इसीलिए गुरु से पता जान लेना चाहिए।”
ईशान – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – सच्चिदानंद ही गुरु के रूप में आते हैं। मनुष्य गुरु से यदि कोई दीक्षा लेता है, तो उन्हें मनुष्य मानने से कुछ नहीं होगा। उन्हें साक्षात् ईश्वर मानना होगा, तभी मन्त्र पर विश्वास होगा। विश्वास हुआ कि सब कुछ हो गया! शूद्र एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य बनाकर वन में बाण चलाना सीखा था। मिट्टी के द्रोण की पूजा करता था –