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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ५५

मास्टर के प्रति उपदेश

(१)

पण्डित और साधु में अन्तर। कलियुग में नारदीय भक्ति

आज बुधवार है; भाद्रपद की कृष्णा दशमी, २६ सितम्बर, १८८३ ई.। बुधवार को भक्तों का समागम कम होता है, क्योंकि सब अपने काम में लगे रहते हैं। प्रायः रविवार को समय मिलने पर भक्तगण श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं। मास्टर को स्कूल से आज डेढ़ बजे छुट्टी मिल गयी है। तीन बजे वे दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में श्रीरामकृष्ण के पास पहुँचे। इस समय श्रीरामकृष्ण के पास प्रायः राखाल और लाटू रहते हैं। आज दो घण्टे पहले किशोरी आए हुए हैं। कमरे के भीतर श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर बैठे हुए हैं। मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने कुशल-प्रश्न पूछकर नरेन्द्र की बात चलायी।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, क्या नरेन्द्र से भेंट हुई थी? (सहास्य) नरेन्द्र ने कहा है, 'वे अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं; जब ठीक ज्ञान हो जाएगा तब फिर वे कालीमन्दिर में नहीं जाएँगे।'

“कभी कभी वह यहाँ आता है, इसलिए उसके घरवाले बहुत नाराज हैं। उस दिन यहाँ गाड़ी पर चढ़कर आया था। गाड़ी का किराया सुरेन्द्र ने दिया था। इस पर नरेन्द्र की बुआ सुरेन्द्र के यहाँ लड़ने गयी थी।”

श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र की बात कहते हुए उठे। बातचीत करते हुए उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में जाकर खड़े हुए। वहाँ हाजरा, किशोरी, राखाल आदि भक्तगण हैं। तीसरे पहर का समय है।

श्रीरामकृष्ण – वाह, तुम तो आज खूब आ गए! क्यों, स्कूल नहीं है क्या?
मास्टर – आज डेढ़ बजे छुट्टी हो गयी थी।
श्रीरामकृष्ण – इतनी जल्दी क्यों?
मास्टर – विद्यासागर स्कूल देखने गए थे। स्कूल विद्यासागर का है, इसीलिए उनके आने पर लड़कों को आनन्द मनाने के लिए छुट्टी दी जाती है।